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गुरुवार, 21 दिसंबर 2017

अन्हेर मचल अछि

जत्तहि देखब नजरि उठा केँ सभठामे अन्हेर मचल अछि |
छथि सांसद जनता केर प्रतिनिधि ,अछि करोड़ मे भत्ता वेतन|
शान ओ शौकत अछि राजा केर , देश विदेश मे अरव खरव धन |
क़ानून बना के तोड़थि अपनेँ, अस्त्र हिनक एहि दल ओहि दल अछि |
सभ ठामे अन्हेर मचल अछि ||
दलक निकलुआ राज्य सभा केर ,मंत्री पद पदवी लय भूखल ,
देशक हित अनहित नहि मतलब ,सत्ता भत्ता केर फल चाखल ,
जनता सँ नहि कोनो मतलब ,धत्ता देब विपक्षक कल अछि |
सभ ठामे अन्हेर मचल अछि ||
राज्यक ई विधान मंडल अछि ,अपना अपनी मे दंगल अछि
सभ के जाति समाजक बल अछि , कुर्शी केर चिंता पल पल अछि ,
पाँच साल लय ई बलबंता , ‘मधुकर’ भूखल जन बेकल अछि |
सभ ठामे अन्हेर मचल अछि ||
***********राम चन्द्र मिश्र "मधुकर" *****

18/11/2016

सोमवार, 18 दिसंबर 2017

विद्यापति स्मृति पर्वक अवसर पर --उगना सँ

शिव उगना बनि एक बेर पुनि मिथिलानगरी आउ |
ई थिक विसपी गाम , सुनब नहि सम्भव एतय नचारी |
सुना परत घर घर आँगन सँ , उकटम पैंचा गारा गारी |
पीपर तर चौपारि कविक छल ,ओतय बिकाइछ तारी |
पीबि केँ सनकल अपनहिँ मे, सभ करैये मारा –मारी|
भाँगक बदला अहूँ पीबि केँ, भरि लबनी भसिआउ |
शिव उगना बनि एक बेर पुनि, मिथिलानगरी आउ ||
आब ने जारनि फारय परत अहाँ केँ एहि ठाँ शंकर|
गैस सिलिंडर सँ चुल्हा जरैत अछि सबहक घर- घर |
हाथ नेने खोरनाठी आब ने कवि पत्नी केँ देखब |
आब ने कवि केर गाए बरद केँ चरा बाध सँ आनब |
घासक बदला चारा दाना कीनि केँ हाट सँ लाउ |
शिव उगना बनि एक बेर पुनि मिथिला नगरी आउ ||
शिव सिंहक दरवार आब ने मोटरी लय केँ जाएब |
प्यासल कवि केँ गंगाजल शिव जटा सँ आनि पिआएब |
चीन्हत आब ने कियो अहाँ केँ हे गंगाधर !
खाहेँ गंगाधार भूमि पर जटा सँ अहाँ बहाउ |
शिव उगना एक बेर पुनि मिथिला नगरी आउ ||
भव्य भवानीपुर मे बनल अहँक स्मारक ,
मेला ठेला हाट बजार लगै अछि अनुपम |
लोटा लोटा जल चढाबय अहँक लिंग पर ,
नारा लगा के जोर जोर सँ हर हर बम बम |
आब ने ओतय अभाव जलक अछि ,पोखरि कूप नहाउ |
शिव उगना बनि एक बेर पुनि मिथिला नगरी आउ ||
अहाँ अदृश्य भेलौं तँ कवि पागल बनि केँ बौएला
आब ने ताकत कियो रने वन ,उगना रे मोर कतय गेला ?
शिव वाणेश्वर लिंग रूप मे आब देब ककरा दर्शन ,
भक्त अहाँ के आब ने मिथिला कविवर विद्यापति सन |
स्वर्ग सँ पुनि कवि विद्यापति केँ मिथिला नगरी लाउ |
शिव उगना बनि एक बेर पुनि मिथिला नगरी आउ ||
******राम चन्द्र मिश्र "मधुकर",  *****
13/11/2016

शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

कहू गर्व सँ हम मैथिल छी

छी  मैथिल जते कहाबी , नहि मिथिला नाम घिनाबी | 
सभ फुसिये  गाल बजाबी ,अछि  खूब कविलती दावी |
  अपनों हक उचित ने पाबी ,नहि मिथिला नाम घिनाबी ||
सभ स्वार्थे  मे घुरियाबी ,कहि जाति  अजाति  लड़ाबी ,

दिन बैसल  ब्यर्थ  बिताबी ,गौरव  टा   ब्यर्थ    देखाबी | 
गढ़ि- गढ़ि के बात बनाबी ,नहि मिथिला नाम घिनाबी ||
   कहु गर्व सँ हम छी मैथिल ,कए सकल राज्य नहि हासिल ,
 नहि रहल परस्पर हिलमिल ,अपना मे कएल  फुटौअलि | 
झुट्ठे के  गाल   बजाबी ,  नहि  मिथिला नाम  घिनाबी ||
सभ जाति छी  मिथिलाबासी ,मैथिल  सन्तान   प्रवासी ,
त्यागू  आलस्य   उदासी ,  सभ  द्वेष  जे    सत्यानासी |
मिलि जुलि के जोर लगाबी ,नहि मिथिला नाम घिनाबी ||
नहि  पाश्चाताप  केने  फल ,नहि   कोनो अर्थ मे निर्वल ,
लेब  राज्य  एकता  केर बल ,हो प्राप्त  रहय जे  जागल  | 
क्षमता सभ अपन देखाबी , नहि मिथिला नाम घिनाबी ||
हम  शक्ति उपासक मैथिल, हम   करब अवश्ये  हासिल ,
  हम क्रान्तिकरब  सभ हिलमिल ,सभ जातिक बंधन कए | 
तन  मन धन नाहि नुकाबी ,नहि मिथिला नाम घिनाबी ||
होउ क्रान्ति करक हित तत्पर ,अंदोलन  एहि लय सत्वर ,
नहि करू भरोसा अनकर , निर्माण राज्य जन हितकर  | 
ता मोजर देत ने ‘मधुकर’ , मिथिला नहि राज्य बनाबी ||

✍✍
**राम चन्द्र मिश्र "मधुकर", ***

मंगलवार, 31 अक्टूबर 2017

गो क्रीड़ा- गोबर्द्धन पूजा

कार्तिक शुक्ल परीव गोपगण गोकुलबासी ,
करइत छला इंद्र केर पूजा भक्ति भाव सँ |
इन्द्रे छथि मेघक अधिपति वर्षाक देवता ,
अन्न शाक तृण बसुधा पर हुनके प्रभाव सँ ||
कृष्ण कहल गिरि गोबर्द्धन प्रत्यक्ष देवता ,
गोचारण के क्षेत्र ओएह छथि गाएक पोषक |
हुनके कृपा सँ प्राप्त घास फल मूल आ औषधि ,
इंद्र छोड़ि गोबर्द्धन पूजा अछि आवश्यक ||
कृष्ण कथा सभ मानि कएल गोबर्द्धन पूजा ,
इंद्र कुपित भय वर्षा कए व्रज डूबबय लागल |
कृष्ण उठाओल गोबर्द्धन कनगुरिया आँगुर,
गोर्द्धंन तर प्राण गाए गोपी जन बाँचल ||
व्रज मे तहिये सँ प्रचलित गोबर्द्धन पूजा ,
भारत वर्षक गोपालक गण कएल अनुशरण |
पूजा ई प्रतीक अछि गोरक्षण संबर्द्धन ,
गाएक सेवा मे सभ देवी देवक पूजन ||
गाएक थरि मे गोबर केर बनाय गोबर्द्धन ,
भक्तिभाव सँ जनगण करथि धेनु के पूजन |
चारा पानी औषधि दय के गाएक सेवा ,
रंग बिरंगक गाएक तन सज्जित आभूषण ||
मिथिला मे गोक्रीडा नामेँ हूरा हूरी ,
इंद्रक मेघ मानि केँ शूकर केर प्रताड़न |
करय सवत्सा गाए सिंह सँ शुकर हत्या ,
गोकुल गाए गोप के ऊपर कोपक कारण ||
किन्तु ई हिंसक क्रूर प्रवृतिक अंत प्राय अछि |
गोक्रीडा के नामे हिंसा करब अशोभन |
थिक कर्तव्य धर्म कर्मक करबे अनुपालन ,
पर्वक जे उद्येश्य मूल अछि गोधन रक्षण ||
*************मधुकर ********************
31/10/2016

गुरुवार, 21 सितंबर 2017

कलशस्थापन

शुभ संकल्पक कलशस्थापन !
तन केर घट मे ज्ञानक जल दय , उत्कर्षक अभिनव पल्लव दय ,
विजयक जव केँ कर्म वालुका ,धी विद्या संग मे आरोपण |
शुभ संकल्पक कलशस्थापन ||
सदाचार केर द्रव्य समर्पित ,शुभ विचार के फल कय अर्पित ,
लालित्यक हो वस्त्र आवरण ,एकताक माला हो गुम्फन |
शुभ संकल्पक कलशस्थापन ||
सुभग मन्त्र कर्मक उत्प्रेरण ,प्राणी केर प्रकाशमय जीवन ,
सुख संतोष प्राप्त हो अनुखन ,दीपक ज्योति विकास किरण |
शुभ संकल्पक कलशस्थापन ||
करुणा कृपा आ त्याग भावना ,अपना लय अत्यल्प कामना ,
पर सुख जनहित केर कल्पना ,अनुरागक हो भाव प्रदर्शन |
शुभ संकल्पक कलशस्थापन ||
ममतामयि माताक मूर्ति हो ,सुभग याचना केर पूर्ति हो,
जीवन रण विजयक स्फूर्ति हो ,मंगल मोदक शरण वरण |
शुभ संकल्पक कलशस्थापन ||
मानस उपजय हीन भाव नहि,अशुभ अमंगल केर प्रभाव नहि,
सत्य अहिंसा सँ दुराव नहि ,शक्ति युक्तिमय मानव जीवन |
शुभ संकल्पक कलशस्थापन ||
स्वाहा भ्रष्टाचार हवन कए, नारी मातृस्वरूप नमन कए ,
करू स्तवन शक्तिक मधुकर ,आत्मभाव जीवक प्रतिपालन |
शुभ संकल्पक कलशस्थापन ||
*******************मधुकर **************

सोमवार, 11 सितंबर 2017

देव्यपराधक्षमापन स्तोत्रम् क छायानुवाद

श्री राम चन्द्र मिश्र "मधुकर"

माँ जगदम्वे चरण शरण |
मन्त्र ने जानी तन्त्र ने जानी ,नहि स्तुति करबा के ज्ञान ,
नहि जानी हम करब आवाहन ,नहि अवगति करबा के ध्यान |
हम अहाँक स्तोत्र कथा सँ, मातु सर्वथा छी अनजान ;

नहि मुद्रा सँ हमरा परिचय , केवल करब विलापक ज्ञान |

हम तँ बात एकेटा जानी , ग्रहण जे जननी करय शरण |

माँ जगदम्वे चरण शरण ||
कल्याणी उद्धार कारिणी ,नहि विधान पूजा धारण |
,धनक अभाव स्वभाव आलसी ,कएल ने पाठक सम्पादन |
त्रुटि भेल चरणक सेवा मे ,क्षमा करब हे जग जननी !
पूत कपूत बनब सम्भव अछि ,मात कुमाता नहि केहुखन ?
माँ जगदम्वे चरण शरण ||
पुत्र अहाँके सरल स्वभावक ,पृथ्वी पर बहुतो जग जननी !
हम छी चपल स्वभावक चंचल ,विरल पुत्र हम छी अवणी,
किन्तु त्याग नहि हमर उचित अछि ,नहि जानी एहि केर कारण ?
पूत कपूत बनब सम्भव अछि ,मात कुमाता नहि केहुखन |
माँ जगदम्वे !चरण शरण ||
चरणक सेवा कएल ने कहियो ,नहि धन केलहुँ हम अर्पण ,
स्नेह अहाँ के तद्यपि अनुपम, हम जानी एहि के कारण ,
पुत्र अधम पर स्नेह ममत्वक ,अहाँ कएल निश्चय धारण ,
पूत कपूत बनब सम्भव अछि ,मात कुमाता नहि केहुखन |
माँ जगदम्वे चरण शरण ||
मातु पार्वती हम तँ केलहुँ ,अछि माँ अनेक देवक सेवन ,
वर्ष पचासी आब ने सम्भव ,हमरा सँ सबहक पूजन ?
रहल आश नहि हमरा ककरो, तेँ धेलहुँ अछि अहँक शरण ,
अहूँ कृपा नहि करब हे अम्वे! तँ जाएब पुनि ककर शरण ?
माँ जगदम्वे चरण शरण ||
अहँक मन्त्र केर एको अक्षर ,अधम सँ अधमक कान समाय ,
तँ चांडालो केर मुख निकसय ,वाणी मधुरक उच्चारण ,
दीनो पाबि लैत अछि वैभव ,मंत्राक्षर जे करय श्रवण ,
जप तप अहँक करय विधि पूर्वक ,गति मति प्राप्त विलक्षण |
माँ जगदम्वे चरण शरण ||
अंग लपेटल चिता भस्म छन्हि ,विषम हलाहल अछि भोजन ,
नग्न दिगम्बर माथ जटा छन्हि ,कंठ वासुकी आभूषण ,
भिक्षा पात्र कपाल हाथ मे, जगदीशक पदवी धारण ,
ई महत्व शिव केँ अछि भेटल , अहींक पाणिग्रहणक कारण |
माँ जगदम्वे चरण शरण ||
चन्द्रमुखी हम सत्य कहै छी ,नहि हमरा मोक्षक ईच्छा ,
नहि अभिलाषा आब जगत मे,प्राप्त करी हम वैभव धन ,
नहि विज्ञानक ज्ञान अपेक्षा , नहि सुख भोगक आकांक्षा ,
हमर याचना मातु एकेटा ,नाम जपैत रही जीवन |
माँ जगदम्वे चरण शरण || 
माँ श्यामा हम विधि पूर्वक नहि ,कएल अहाँ के आराधन ,
हम केलहुँ अपराध अनेको , हृदय कठोर भाव चिन्तन ,
किंचित कृपा दृष्टि हमरा पर, प्राप्त अहाँ के अवलम्वन,
दयामयी ई अहींक योग्य अछि ,अपन कुपुत्रो देब शरण |
माँ जगदम्वे चरण शरण ||
हे महेश्वरी ! करुणा सागर ,आफद फँसि केलहुँ सुमिरण ,
शठता हमर क्षमा करु जननी , नहि केलहुँ पद के सेवन ,
ब्यर्थ गमाएल काल स्मरण ,केलहुँ नहि हम भरि जीवन ,
भूखल प्यासें पीड़ीत बालक करय मात्र माएक सुमिरन |
माँ जगदम्वे चरण शरण ||
तद्यपि कृपा अहाँ के पाबी ,नहि कोनो आश्चर्यक बात ?
पुत्र करय अपराध घनेरो ,तदपि उपेक्षा करथि ने मात ,
हमर समान पातकी जग नहि ,पाप हारिणी नहि अहाँ सन ,
उचित बुझी से करी हे अम्वे ! हम मधुकर छी मातृ शरण |
माँ जगदम्वे ! चरण शरण ||

*****************मधुकर **************************


शुक्रवार, 18 नवंबर 2016

{ जनगीत } हम मिथिले मे रहबै

तिरहुत नगरिया तेजि कत्तहु ने जेबै, हे! हम मिथिले मे रहबै |
घरे मे हमरा चारू धाम , हे! हम मिथिले मे रहबै ||
जनकक धीया सीया हमरो बहिनियाँ , हे ! हम मिथिले मे रहबै ,
पाहुन हमर सीरी राम , हे ! हम मिथिले मे रहबै |
एहन कोमल भूमि कत्तहु ने पाएब ,हे ! हम मिथिले मे रहबै ,
स्वर्गो सँ सुन्नर हमर गाम , हे ! हम मिथिले मे रहबै |
कमला आ कोशी गंडक नदिया बहै छै हे ! हम मिथिले मे रहबै ,
दक्षिण जग पावन गंगाधार , हे ! हम मिथिले मे रहबै |
फल –फूल अन्न साग अनुपम सुआद्क हे ! हम मिथिले मे रहबै ,
रसगर ओ मिठगर आम लताम , हे ! हम मिथिले मे रहबै |
पान ओ मखान माँछ सरगो ने भेटय हे! हम मिथिले मे रहबै ,
जते बेर जन्म होय मिथिले मे जनमी हे !हम मिथिले मे रहबै ,
‘मधुकर’ ई मिथिला ललाम , हे ! हम मिथिले मे रहबै ||
**********************मधुकर ********************************

2/11/2016

शुक्रवार, 4 नवंबर 2016

सामयिक प्रसंग


&&मिथिलाक छठिव्रत -नहाय खाय आ खरना विधान&&
चौठ सँ भऽ प्रारम्भ सप्तमी तिथि तक, छठि व्रत करब नियम |
लोक आस्था केर पावनि ई ,श्रद्धा भाव भक्ति अनुपम ||
चौठ- नहाय –खाए के विधि अछि ,परम्पराक करब पालन |
मिथिला के घर घर ई पावनि, विधि वत नियमक अनुपालन ||
चौठ - नहाय -खाय -----
खरना सँ पहिनेँ चौठक तिथि ,नदी स्नान निरामिष खाए |
ली संकल्प आराधन हेतुक , देहु मनोरथ माए पुराय ||
व्रती राति मे भूमि शयन कर ,पूर्ति हेतु मन के मनकाम |
गाबय गीत सुनय जाग्रत मन , रहय लैत षष्ठी के नाम ||
अरवा भात दालि खेरही के , सजमनि के सादा तरकारी |
सादा सादी हो पवित्रता , उपजल अपना बारी झारी |
पंचमी - खरना ----------
अरवा चौर दूध हो गाएक ,कुसियारक रस टटका गूर |
अति पवित्र माँटिक चुलहा हो , गाएक गोबर चौका पूर ||
माँटि वा पित्तरि के वासन हो, गीत गाबि केँ रान्ही खीर |
जारनि सेहो पवित्र काठ के , धोल पखारल पावन नीर |
षष्ठी सूर्यक कए आराधन, भक्तिभाव नैवेद्यक अर्पण|
जतबा सम्भव हो , मधुर फल, भक्ति भाव सँ करी समर्पण ||
भोग लगा षष्ठी दिनकर केँ, करी प्रसादक वितरण |
आस्था सँ जे करय नेम व्रत , हो सभ कष्ट निवारण |
ई विधि नेम व्रती कर केवल , आन ने क्यो छूबय छाबय |
खीर मधुर पकमान मधुर फल , भक्ति सँ भोग लगाबय |
शुचि आचार विधि नियमक पालन , भाव ने कुत्सित मन आबय |
ओ षष्ठी देवी के संगे ,मधुकर कृपा दिनकरक पाबय ||
**********************मधुकर *********************
4/11/2016

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2016

बढू क्राँँति के ध्वजा उठौने

||  बढू क्राँँति के ध्वजा उठौने ||

पूर्वज ऋषि मुनि जे केलन्हि मिथिला सीमांकण| 
एखनहुँ अछि ओहि क्षेत्रक विद्या ज्ञान परम धन||
एखनहुँ एतय के लोक जगत मे जेहिठाँ गेला 
अप्पन कर्म कुशलता सँ ओ चर्चित अर्चित भेला | 
अतुल विद्वता क्षमता रहितो मैथिल अनमन |
मातृ भूमि लय नहि कए सकला किछुओ चिन्तन |
तिरहुत के विकास कार्य रहला अनठौने |
नहि हक हासिल बिना हो मिथिला राज्य बनौने ||
जागू आगू बढू क्रान्ति के ध्वजा उठौने ||
देश भेल आज़ाद भेल छल उपगत अवसर|
पृथक राज्य लय नहि उत्सुक जन प्रतिनिधि केर स्वर |
राज्यक बनने छोटो भूमि खण्ड अगुआएल |
बनि पछ्लगुआ मिथिला दिन प्रतिदिन पछुआएल |
बाजि ने सकला रहला सभ दिन मूँह नुकौने |
लूटि केँ खेलक आन रहल मिथिला बिलटौने ||
जागू आगू बढू क्रांति के ध्वजा उठौने ||
आबहु जँ जागब तँ निज अधिकार केँ पाएब |
केंद्र तथा राज्यक सरकार केँ बात जनाएब ||
मैथिल समग्रता केर भास्वर स्वर जा ने सुनाएब |
क्षमता प्रभुता जना केँ नेता देश हिलाएब |
दुःख दरिद्रता भागत घर घर सूप डेङौने |
जागू आगू बढू क्रांति के ध्वजा उठौने ||
***************मधुकर***********************


सोमवार, 24 अक्टूबर 2016

मैथिल बनू प्रज्वलित चिनगी

  || मैथिल बनू प्रज्वलित चिनगी||

छलहुँ गाछ केर जरिआठी अँह,आइ बनल छी फुनगी |
छलहुँ एकदिन धह –धह धधरा ,आइ पझाएल चिनगी |
मैथिल बनू प्रज्वलित चिनगी ||
छलहुँ ज्ञान विद्या केर सागर ,आइ बनल छी लघुतम गागर |
छलहुँ चेतना रूप समुज्ज्वल , सभठाँ पाबी आइ निरादर |
अपनेँ जेना तेना बीति गेलहुँ, कोना बीतत सन्तति केर जिनगी ?
मैथिल आइ बनल छी फुनगी |
हवन कुण्ड मे क्रांतिक घृत दय, अग्नि अतुल ज्वाला धधकाउ|
मिथिला राज्य प्राप्त करबा मे, पाछू पग नहि आब हटाउ|
आवश्यक तृण पवन योग सँ, चिनगी लहकी सुनगी |
बनल नहि रहू छौर तर चिनगी ||
मिथिला राज बनौने बिनु नहि ,चैन शान्ति सुख पाएब |
खेती आ उद्योग समिश्रित ,समृद्धि राज्य बनाएब |
आलस त्यागू काज मे लागू आब ने ताकू अलगी बलगी |
मैथिल बनू प्रज्वलित चिनगी ||
*****************मधुकर **************************


रविवार, 23 अक्टूबर 2016

अभियान गीत

    || अभियान गीत ||

फाँर बान्हि केँ तत्पर मैथिल ,करू सफल अभियान |
मिथिला राज्यक हेतु समर्पित ,करियौ जान परान ||
भारत मे जे राज्य बनल अछि ,सभक अपन अछि नाम |
किन्तु राज्य पौराणिक मिथिला, आइ भेल गुमनाम |
सात कोटि मैथिल केर संख्या ,सभ गुम्मी लधने छी |
एकरा लय नहि कोनो हरबड़ी, बैसल दम सधने छी |
आब अधिक देरी लागत तँ, भागत दूर निदान |
मिथिला राज्यक हेतु समर्पित, करू जान आ प्राण ||
ब्राह्मण क्षत्री वैश्य शूद्र नहि ,डफली अपन बजाउ |
सभ मिलि राग एकेटा तानू ,गीत विजय के गाउ |
सभटा स्वर के श्रोत मिला केँ,शक्तिक सिन्धु बनाउ ,
बाधा केर पर्वतो ठाढ़ यदि , ओकरा ढाहि बहाउ ,
कए निर्माण राज्य मिथिला केर ,राखू पूर्वज मान |
मिथिला राज्यक हेतु समर्पित ,करू जान आ प्राण ||
मिथिला केर पुश्तैनी धंधा ,घुमा केँ आनत वैभव ,
खेती चलत सुडारि तँ भागत, सकल अभाव पराभव ,
लघु उद्योगक बलेँ दरिद्रा ,केँ भगैब अछि सम्भव ,
राज्यक बनने स्वयं विकासक ,साधन आएत नव नव,
मिथिला केँ समृद्धि बनाओत ,पान ओ माँछ मखान |
मिथिला राज्यक हेतु समर्पित ,करू जान आ प्राण ||
रहलहुँ स्त्तरि वर्ष सँ हम सभ, प्राँत बिहारक संग ,
बनल योजना नहि विकास केर ,दिन दिन आशा भंग ,
तिरहुत नामक छलो डिवीजन ,तकरो भेल निपात ,
नाम धाम केँ मेटा देल अछि ,राजनीति आघात ,
‘मधुकर’ मिथिला राज्ये बनने , मैथिल बनब महान |
मिथिला राज्यक हेतु समर्पित, करू जान आ प्राण ||
******************मधुकर ******************

23/10/2016

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2016

मिथिला हमर महान

   || मिथिला हमर महान||
                                        राम चन्द्र मिश्र "मधुकर
 समधियौर अवधक नृप दशरथ ,
राम ब्रह्म केर प्रिय सासुर |
जनक विदेहक गृह थिक मिथिला ,
तुच्छ एकर आँगा सुरपुर ||
भारत पुरी अनेक कहाबय ,
सभ मे मिथिलापुरी महान |
कण कण भूमि यज्ञ सँ सेदल ,
मैथिल ज्ञानी आ विद्वान ||
जतय भूमि के उपजा सीता ,
दुष्ट दनुज कुल नाशी |
जग जननी जानकी के जनगण ,
सदा सतीत्व उपासी ||
वेद शास्त्र उपनिषदक रचना,
ग्रन्थ रत्न षडदर्शन |
भोग गृहस्था श्रम के करितो ,
मुक्त मैथिलक जीवन ||
देवी शक्ति विष्णु शिव दिनकर,
गणपति पंचदेव पूजन |
नेम टेम व्रत पावनि श्रद्धा ,
युक्त करथि मैथिल जनगण ||
सजल धजल शुभ वेश पुरातन ,
धोती चपकन दोपटा पाग |
एतय केर विधि व्यवहार सनातन
,गीत नाद मधुमय अनुराग ||
षड ऋतु अनुभव परम मनोहर ,
प्राकृतिक सौंदर्य महान |
खान पान सौन्दर्य सुधामय ,
स्वर्गहु दुर्लभ पान मखान ||
शस्य पूर्ण रह सभ नक्षत्र मे,
अन्नपूर्णा केर आँचर |
मालभोग आ धान सतरिया ,
मह - मह चौरी आ चाँचर |
घर घर मे गोसाउन कुल देवी ,
अचला रमा स्वरूपा |
देवो सँ नर रूप मनोहर ,
नारी सौन्दर्य अनूपा |
कलासिद्ध जग मे प्रसिद्ध छथि ,
मिथिला के नारी नर |
मिथिला सन नहि दोसर जग मे ,
उपमा कोनो ‘मधुकर’ ||
     
 
 रचित -








* राम चन्द्र मिश्र "मधुकर *
28/10/2016