हँ हम उर्मिला छीअस्तित्व विहीन संघर्ष रतअपना आप के ढुढ़ैत तकैतपरित्यक्ते त रहलहुँ हमहुँपूरा पूरी चौदह सालदीप लेसि हम अंतर बाहरताकी पहु निज दुनू ठामबाहर दीपजरैअछि टिम - टिम
अंतर मन में हाहाकारकर्मक नहि भेटल अधिकारपथ बाधा त नहिञें बनितहुँएकमात्र आशा छल प्रिय सँ
भरलनि अंतर मन बस ज्वारलए चलितथि हमरो निज संगरचलन्हि बिधना केहन विधाताकेलनि विधाता की हमरा संगसिये-सिये जपितथि नहि सभजन
पुरितइ हमरो सभ मनकामजइतहुँ वन जौं हमहुँ पहु संगदेखितथि हमरो हृदयक संताप
दुनू बहिनी रहितहुँ संग मिलीमेटितहुँ भरिसक विधिक - विधानतरसै अछि दर्शन विनु नैन
कल्पना झा
Maithili Sahasin Mahasabha
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शनिवार, 16 दिसंबर 2017
उर्मिला
गुरुवार, 16 नवंबर 2017
अबला नारि --- कल्पना झा
पुरातनि सँ सदति नारि , अपन कर्तव्य करैत छथि
आख्यानों में ई ब्याख्या , मनीषि सभ केने छथि
अगर भूलो सँ जौं नारि , नहि करती कर्म ओ अप्पन
त ई श्रृष्टि कोना बाँचत , एतेक त सभ जानए छी
अहिल्या जे शिला बनली , तकर अनुमान अछि किनको
छललि गेली ओ पुरुषे सँ , भेलनि उद्धार पुरुषे सँ
मुदा नारिक ई पीड़ा , नहि बुझलक आई तक कीयो
रचल किनकर ई विधना छी , बुझाओत ई बुझौअल के
स्वयंवर जीति के अनला , कहाबैत छला धनुर्धर जे
पति पाँचो धुरंधर छलनि , सगर संसार जानैत छी
छलल अपने सँ ओ गेली , जे अबला नारि बनि गेली
जे अग्नि पुत्री छली ज्वाला , लगाओल दाव पर गेली
बाँचत सम्मान कोना के , कठिन ई प्रश्न अछि सोचू
मिझाओल दीप जौं राखब , भेटत उजियार कोना के
हवस के भेंट जौं चढ़ती , सदति श्रृष्टि के निर्मात्री
तखन श्रृष्टि कोना बाँचत , एतेक त सभ जानैत छी
लेखक -:
कल्पना झा
१६. ११. २०१७
छठिक ओरियाओन गीत
उठु -उठु ब्राह्मण पंडित,दियौ पोथिया उचारि
पूजब मन सँ आदित्य के,
आदित्य होऊ ने सहाय ।
उठु - उठु डोमबा हो भइया,दियौ डगरा बनाय
पूजब मन सँ आदित्य के,
आदित्य होऊ ने सहाय ।
उठु - उठु चमरा हो भइया,ढोल पिपही बजाऊ
पूजब मन सँ आदित्य के
आदित्य होऊ ने सहाय ।
उठु - उठु कुम्हरा हो भइया,दियौ कोशिया बनाई ,कुड़बार हाथी बनाऊ
पूजब मन सँ आदित्य के
आदित्य होऊ ने सहाय ।
उठु - उठु जोलहा हो भईया,आरतक पात बनाऊ , आओर बद्धी बनाऊ
पूजब मनसँ आदित्य के
आदित्य होऊ ने सहाय ।
उठु - उठु कमरा(बढ़ई )हो भईया,दियौ सांचा बनाई
पूजब मन सँ आदित्य के
आदित्य होऊ ने सहाय ।
उठु - उठु तेलिया हो भईया,दियौ तेल पेड़ाई
पूजब मन सँ आदित्य के
आदित्य होऊ ने सहाय ।
उठु - उठु हलुवाईया हो भईया,दियौ मधुर बनाई
पूजब मन सँ आदित्य के
आदित्य होऊ ने सहाई ।
उठु - उठु गुअरबा हो भईया,दियौ दुधवा दुहाई
पूजब मन सँ आदित्य के
आदित्य होऊ ने सहाई ।
उठु - उठु मलिया हो भइया,फूलक माला बनाऊ
पूजब मन सँ आदित्य के
आदित्य होऊ ने सहाय ।
उठु - उठु कुजड़ा हो भइया,दियौ सजमनि तोराई
पूजब मन सँ आदित्य के
आदित्य होऊ ने सहाय ।
उठु - उठु बनियाँ हो भईया,दियौ सौदा अनाई
पूजब मन सँ आदित्य के
आदित्य होऊ ने सहाय ।
उठु - उठु धानुक हो भईया,दियौ घाट बनाई ,दियौ अंगना निपाय
पूजब मन सँ आदित्य के
आदित्य होऊ ने सहाय ।
उठु - उठु कोइरी हो भइया,अल्हुआ सुथनी कोड़ाऊ ,सभ फल लए आऊ
पूजब मन सँ आदित्य के
आदित्य होऊ ने सहाय ।
सभ बरण मिलि आबू,छठिक डलबा सजाऊ
सभ मिलि चलू पोखरि घाट,
सभ मिलि पूजू छठि माई
सभकक सभ मनकामना,संतति कुलपरिबार
आदित्य आओर छठि मईया
भरता अँचरा हमार ।
भरता अँचरा हमार ।
भरता अँचरा हमार ।
जय छठि मैया !!!!!
********************
कल्पना झा
२६ .१० . २०१७
--- भगवान भास्कर के समर्पित एहि पोस्ट में
हम किछु अनुचित बातक चर्च केलहुँ अछि
किनको आहत करबाक कोनो उद्येश्य नहि
मात्र सभक आँखि खोलबाक एगो प्रयास
जाति पातिक भेद जखन भगवाने नहि करैत छथि त अनेरे
हम सभ कियेक ..........
मंगलवार, 26 सितंबर 2017
उपासना
एकटा छथि,माँ जगजननी महाकाली !सभक रक्षनार्थ,दुखिया के दुःखहारिणीपालनकारिणि महागौड़ीके नहि जनैछ हिनक महिमा..माँ जगदम्बा !तें की ?ओहो त स्त्रिये छथि ..ओ त भवभंजनि महाकालिका थिकीहहम सभ हुनका अबला कहबनि !नहि ने ?हुनक जीबन कि अकंटक छलन्हि ?साक्षात् रणचण्डी। !त की ?हम सभ सदति ..
कथमपि नहिं .आख्यान ब्याख्यान भरल परल अछि ,पूजा अर्चना क संग ...हुनक कंटकमय गाथा सँ ..जीबन जिबाक प्रेरणा लैत छी ।हुनक कंटकमय गाथाक ...श्रवण मनन करैत छी ।तअ कहू त कियेक नहि ..हुनकहि सँ ..एहि बातक बिचार केने बिनाकियेक कनियों दुःख सँ ..अति दुःखी भए ...अपन आराध्या क आगू ...गिरगिराइत रहैत छी ,जे ओ अपराजिता ..महाकाली माएकतेक द्रवित हेतीह ..हमर सभक अकर्मण्यता पर ,तअ आऊ ..कतेक क्षुब्ध हेतीह ,पूजा उपासना कहम सभ मिलि प्रण करीजानबा , बुझबाक ...
अनर्गल अर्थ जानि ,पूजा उपासना क सही अर्थ
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