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शनिवार, 16 दिसंबर 2017

उर्मिला

हँ हम उर्मिला छी
अस्तित्व विहीन संघर्ष रत
अपना आप के ढुढ़ैत तकैत
परित्यक्ते त रहलहुँ हमहुँ
पूरा पूरी चौदह साल
दीप लेसि हम अंतर बाहर
ताकी पहु निज दुनू ठाम
बाहर दीपजरैअछि टिम - टिम

अंतर मन में हाहाकार
कर्मक नहि भेटल अधिकार
पथ बाधा त नहिञें बनितहुँ
एकमात्र आशा छल प्रिय सँ

भरलनि अंतर मन बस ज्वार
लए चलितथि हमरो निज संग
रचलन्हि बिधना केहन विधाता
केलनि विधाता की हमरा संग
सिये-सिये जपितथि नहि सभजन

पुरितइ हमरो सभ मनकाम
जइतहुँ वन जौं हमहुँ पहु संग
देखितथि हमरो हृदयक संताप

दुनू बहिनी रहितहुँ संग मिली
मेटितहुँ भरिसक विधिक - विधान
तरसै अछि दर्शन विनु नैन
 

कल्पना झा

गुरुवार, 16 नवंबर 2017

अबला नारि --- कल्पना झा


 
पुरातनि सँ सदति नारि , अपन कर्तव्य करैत छथि
आख्यानों में ई ब्याख्या  , मनीषि  सभ  केने छथि 
अगर भूलो सँ जौं नारि , नहि करती कर्म ओ अप्पन 
त  ई  श्रृष्टि कोना बाँचत , एतेक  त सभ  जानए छी
अहिल्या जे शिला बनली , तकर अनुमान अछि किनको
छललि गेली ओ पुरुषे सँ , भेलनि  उद्धार  पुरुषे  सँ
मुदा नारिक ई पीड़ा , नहि बुझलक आई तक कीयो
रचल किनकर ई विधना छी , बुझाओत ई बुझौअल के
स्वयंवर जीति के अनला , कहाबैत छला धनुर्धर जे
पति पाँचो धुरंधर छलनि , सगर संसार जानैत छी
छलल अपने सँ  ओ गेली , जे अबला नारि बनि गेली
जे अग्नि पुत्री छली ज्वाला , लगाओल दाव पर गेली
बाँचत सम्मान कोना के , कठिन ई प्रश्न अछि सोचू
मिझाओल दीप जौं राखब , भेटत उजियार कोना के
हवस के भेंट जौं चढ़ती , सदति श्रृष्टि के निर्मात्री
तखन श्रृष्टि कोना बाँचत , एतेक त सभ जानैत छी
लेखक -:
 कल्पना झा 
१६.  ११. २०१७ 

छठिक ओरियाओन गीत


उठु -उठु ब्राह्मण पंडित,दियौ पोथिया उचारि पूजब मन सँ आदित्य के, आदित्य होऊ ने सहाय ।
उठु - उठु डोमबा हो भइया,दियौ डगरा बनाय 
पूजब मन सँ आदित्य के,
आदित्य होऊ ने सहाय ।

उठु - उठु चमरा हो भइया,ढोल पिपही बजाऊ 
पूजब मन सँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाय ।

उठु - उठु कुम्हरा हो भइया,दियौ कोशिया बनाई ,कुड़बार हाथी बनाऊ 
पूजब मन सँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाय ।

उठु - उठु जोलहा हो भईया,आरतक पात बनाऊ , आओर बद्धी बनाऊ
पूजब मनसँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाय ।

उठु - उठु कमरा(बढ़ई )हो भईया,दियौ सांचा बनाई 
पूजब मन सँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाय ।

उठु - उठु तेलिया हो भईया,दियौ तेल पेड़ाई 
पूजब मन सँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाय ।

उठु - उठु हलुवाईया हो भईया,दियौ मधुर बनाई 
पूजब मन सँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाई ।

उठु - उठु गुअरबा हो भईया,दियौ दुधवा दुहाई 
पूजब मन सँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाई ।

उठु - उठु मलिया हो भइया,फूलक माला बनाऊ 
पूजब मन सँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाय ।

उठु - उठु कुजड़ा हो भइया,दियौ सजमनि तोराई 
पूजब मन सँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाय ।

उठु - उठु बनियाँ हो भईया,दियौ सौदा अनाई 
पूजब मन सँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाय ।

उठु - उठु धानुक हो भईया,दियौ घाट बनाई ,दियौ अंगना निपाय 
पूजब मन सँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाय ।

उठु - उठु कोइरी हो भइया,अल्हुआ सुथनी कोड़ाऊ ,सभ फल लए आऊ 
पूजब मन सँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाय ।

सभ बरण मिलि आबू,छठिक डलबा सजाऊ 
सभ मिलि चलू पोखरि घाट, 
सभ मिलि पूजू  छठि माई

सभकक सभ मनकामना,संतति कुलपरिबार
आदित्य आओर छठि मईया 
भरता अँचरा हमार ।
भरता अँचरा हमार ।
भरता अँचरा हमार ।

जय छठि मैया  !!!!!
********************
कल्पना झा
२६ .१० . २०१७

--- भगवान भास्कर के समर्पित एहि पोस्ट में 
हम किछु अनुचित बातक चर्च केलहुँ अछि
किनको आहत करबाक कोनो उद्येश्य नहि
मात्र  सभक आँखि खोलबाक एगो प्रयास
जाति पातिक भेद जखन भगवाने नहि करैत छथि त अनेरे 
हम सभ कियेक ..........