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सोमवार, 20 नवंबर 2017

पियासल पिआस

बुन्न एक मांगलौं जलक मुदा सागर सँ छल पिआस पैघ 
तापस बाला सन जीवन अद्भुद 
मोन कोनो बात पर कसकल नै 
ई सिकायत अधरों पर नहि आयल 
मेघ किएक हम्मर आँगन बरसल नहि ?
मरुथली रौद में जरैत पइर 
छाहरि लेल तरसल नहि !!
तट सं दूर भँवरक मध्य 
कम्पित लहरि सन भाग्य हम्मर रहल 
सुखक की रहत सौगात 
दुखो रहि  जेल अनकहल !!
नोरक एहि बरखा में 
तीतल  स्वप्न मुदा सिसकल नहि 
आलोक किरण बिखरि गेल 
सर्त  कतेको साथ में 
सुरभि फूल सं विलग कत '
बन्हल तमिस्रा पाश में। 
अहाँ कत्तौ रहु प्यार हम्मर रहत 
अहाँ कत्तौ रहु भावना हम्मर रहत 
आयुक सीमा में नहि आयल ओ दिवस 
दूर अहाँ सं रहि बितैलोँ हम्म 
मूर्च्छित प्राणक तार पर 
सौ गीत विरह केँ गबलहुँ हम्म -----

-डॉ शेफालिका वर्मा

शनिवार, 18 नवंबर 2017

मिथिलाक शान बसुआरा गाम

दरभंगा अईछ मिथिलाक शान 
    जई मे बसैत अछि हमर प्राण
 स्वर्ग स सुन्दर ग्राम अछि हमर
     जेकरा कहैत मिथिलाक शान
नाम अछि ओकर बसुआरा गाम 
     जई स उखरल उज्जवल नाम
 करैत अहाँ सबके प्रणाम 
     कहू अहाँ किछू कहब की
कहब की हम देखने छी हाँ यो 
       हम बजै छी उज्जवल जी
 ओलक सब्जी खा क रहै छी 
        हमरा लग की बात छोड़ई छी
  अहाँ करी ओल पसंद
       तै नई करैत अछी महिला तंग
  आइब देखू बसुआरा गाम 
             स्वर्ग स सुन्दर अछि ई गाम 
 जई मे होईत अछि राजा आम 
             अहाँ खाईत छी अमावट
   हमरा लग की करब जमावट
            हम करै छी वर्णन शेष
        पूरा मिथिला दिअ संदेश ।।
लेखक -:

नाम - उज्जवल कुमार झा 
पिता का नाम- श्री शम्भू नाथ झा 
पता- बसुआरा दरभंगा बिहार 
पुरस्कार-  ऑल इंडिया राइटिंग कम्पीटीशन्स 
(पेन इट टू विन इट जनवरी  2017) 
के विजेता, और  प्रतिभा सम्मान विजेता 

संकट मे साथ भगवानक हाथ

घुईर देखू  मिथिला के हाल

बाइढ़ स मिथिला भेल बेहाल
जे देला संकट मे साथ 
ओ बनला भगवानक हाथ
एम.एस.यू. के नाम अछि आगू
सरकारो किछू राशन पठाबू
अठारह जिला मे टीम बनई अइछ
दिअ अई मे मिलजुइल संग
तखने अपनो मिथिला बनत दुनिया के रे विकसित अंग
क्रांतिकारी सेनानी मिल क करई छथि सबके प्रसन्न
अई संकट मे घर-घर जा क दई छथि कपड़ा औरो अन्न
मिथिला के रे रोगी सबके होइक मिथले मे ईलाज
अई लेल सब सेनानी मिल क उठेला एम्स लेल आवाज
एम.एस.यू. के के छथि सेनानी कहत हिनकर सबहक काज
उज्जवल अछि मिथिला के बेटा हरिदम एम.एस.यू के साथ 
-----------:--
नाम - उज्जवल कुमार झा 
पिता का नाम- श्री शम्भू नाथ झा 
पता- बसुआरा दरभंगा बिहार 
पुरस्कार-  ऑल इंडिया राइटिंग कम्पीटीशन्स 
(पेन इट टू विन इट जनवरी  2017) के विजेता, 
और  प्रतिभा सम्मान विजेता 

पावस पीड़


राति  पावस  घोर  घन  गर्जन
दामिनि दमकि डराबय |
वैरिन  पवन  संग  दादुर  बोल 
अंतस   पीड़   बढ़ाबय ||
            प्रीतम  वास परदेस रे--
षोड़स  वसन्त  रंग दर्शन पारे
युगल गिरवर तनधारै  |
पवन  पयोधरि  वसन उघारय 
अगिन दहन मन जारै ||
               के  देत सजन  उदेश रे---
मानिनि  मन  बड अभिभानी
अंतस हेलि हिलोरय |
सकल  विकलता नैने  नाचय
विरहे  प्रीत घोरय ||
            मन दर्शन हरि अशेष रे ---
हिरदय  आँगन गोकुल मथुरा 
राधा वृन्दावन माँझे |
वन वन मन डोलय सदिखन
वाँछा  दरशन साँझे ||
              धरू प्रीतम नटवर वेष रे- 

आनंदक आभा चहुँ ओर

लेखक : पूर्णेन्दु झा 'बख्शी'

उदयाचलमे अरुणादित्यक                                                                                  
           दर्शन जखने तखने भोर!
आयल भोरहु सहजहि तहिना
           आनंदक आभा चहुँ ओर!!
आनंदित भ' अपन नीड़सँ
             बाहर खेचर करइछ सोर !
सोर मचौने आनि पसारल
              आनंदक आभा चहुँ ओर!!
जागय हमरहु दुनियाँ तहिना
          मानि अपन ई अभिनव भोर!
मुदित प्रभाकरसँ आयल अछि
              आनंदक आभा चहुँ ओर !!
साम्राज्यहु जे राखि बनौने
                दुष्ट कुहेस बड़े घनघोर!
दुष्टक अंतो पाबि सुनिश्चित
              आनंदक आभा चहुँ ओर!!
रुण्ड-मुण्ड भेल दुष्टहु तखने
            भेल उमंगक बड़ हिलकोर!
 अहिना जगमे होअय तहिसँ
              आनंदक आभा चहुँ ओर !!
शांतिबयार बहय भोरहिसँ
              डोलय ई मन तहिसँ जोर!
भाग्य सूर्य तन-मनकेँ जहिसँ
              आनंदक आभा चहुँ ओर!!
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शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

बउआ के हत्यारा के आब फाँसी चढ़ा दिअ

अत्याचार के अति भ गेल आबो सजा दिअ

हयो मिथिला पड़ल विपति मे सब मिल क् बचा लिअ

हम्मर बउआ आँखिक तारा,छल हम्मर ओ फूल यो

किया पठेलउ ओइदिन हमहूँ ओई कातिल स्कूल यो
पूरा दुनिया मांगि रहल बस न्याय दिया दिअ
हयो बउआ के हत्यारा के आब जिंदा जला दिअ
सब सेनानी न्याय मांगई लेल गेला ओई स्कूल यो
प्रशासन के बुद्धी देखी गेला दुख मे डुईब यो
सीबीआई स् जाँच  कराबू कातिल के पहीने पकराबू
आ ओई पापी अपराधी के कनी हमरो चिन्हा दिअ
हयो बउआ के हत्यारा के आब फाँसी चढ़ा दिअ
आबो बढू आगू सब मिल एम.एस.यू के साथ यो
अत्याचार के खत्म करई लेल बढ़ाबू अप्पन हाथ यो
मिथिला क्षेत्र आ छात्रक लेल बस न्याय दिया दिअ
हयो बउआ के हत्यारा के आब जिंदा जला दिअ
हयो प्रद्यूम्न के हत्यारा के आब फाँसी चढ़ा दिअ  ।। 

- :-

नाम - उज्जवल कुमार झा 
पिता का नाम- श्री शम्भू नाथ झा 
पता- बसुआरा दरभंगा बिहार 
पुरस्कार-  ऑल इंडिया राइटिंग कम्पीटीशन्स 
(पेन इट टू विन इट जनवरी  2017) के विजेता,
 और  प्रतिभा सम्मान विजेता 

सहज प्रकृति अनुकूल

बाड़ीमे बड़ हरियर लत्ती
                               लत्तीमे बड़ फूल छै!

हरियर गाछहु फूलसुशोभित
                       सहज प्रकृति अनुकूल छै!!
झूमि रहल छै हरियर झाड़ी
                               झूमै तकरो फूल छै!
झूमब,झलकब,रहब फुलायल
                       सहज प्रकृति अनुकूल छै!!
पीयर,उज्जर,लाल,गुलाबी
                              रंग-विरंगक फूल छै !
मनमोहक जे फूल गुलाबक
                             संगहि तकरो शूल छै!!
रहब सुरक्षित शूलक संगहु
                             तहिमे नहिओं भूल छै!
अप्पन जिनगी राखि बचायब
                        सहज प्रकृति अनुकूल छै!!
निर्विकार मोनहु फूलहि सन
                            बनल सुसंगतिमूल छै !
मोनहि मोनहु मोहने राखब
                        सहज प्रकृति अनुकूल छै!!
मोन बनय मनमीतहु तहिना
                           जहिना मीतहि फूल छै!
मोन मनोहर राखि बचायब
                        सहज प्रकृति अनुकूल छै!!
पाबि सहारा लिपटि बढ़ब नित
                             नेहिल मनसमतूल छै!
नेहिल मन सँ करब समुन्नति
                        सहज प्रकृति अनुकूल छै!!
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लेखक : पूर्णेन्दु कुमार झा

संपर्क
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पूर्णेन्दु कुमार झा
ग्राम+पत्रालय:हरिपुर बख्शी टोल
भाया:कलुआही
जिला:मधुबनी
बिहार-847229
मो.नं.:9905860342

गुरुवार, 16 नवंबर 2017

अबला नारि --- कल्पना झा


 
पुरातनि सँ सदति नारि , अपन कर्तव्य करैत छथि
आख्यानों में ई ब्याख्या  , मनीषि  सभ  केने छथि 
अगर भूलो सँ जौं नारि , नहि करती कर्म ओ अप्पन 
त  ई  श्रृष्टि कोना बाँचत , एतेक  त सभ  जानए छी
अहिल्या जे शिला बनली , तकर अनुमान अछि किनको
छललि गेली ओ पुरुषे सँ , भेलनि  उद्धार  पुरुषे  सँ
मुदा नारिक ई पीड़ा , नहि बुझलक आई तक कीयो
रचल किनकर ई विधना छी , बुझाओत ई बुझौअल के
स्वयंवर जीति के अनला , कहाबैत छला धनुर्धर जे
पति पाँचो धुरंधर छलनि , सगर संसार जानैत छी
छलल अपने सँ  ओ गेली , जे अबला नारि बनि गेली
जे अग्नि पुत्री छली ज्वाला , लगाओल दाव पर गेली
बाँचत सम्मान कोना के , कठिन ई प्रश्न अछि सोचू
मिझाओल दीप जौं राखब , भेटत उजियार कोना के
हवस के भेंट जौं चढ़ती , सदति श्रृष्टि के निर्मात्री
तखन श्रृष्टि कोना बाँचत , एतेक त सभ जानैत छी
लेखक -:
 कल्पना झा 
१६.  ११. २०१७ 

छठिक ओरियाओन गीत


उठु -उठु ब्राह्मण पंडित,दियौ पोथिया उचारि पूजब मन सँ आदित्य के, आदित्य होऊ ने सहाय ।
उठु - उठु डोमबा हो भइया,दियौ डगरा बनाय 
पूजब मन सँ आदित्य के,
आदित्य होऊ ने सहाय ।

उठु - उठु चमरा हो भइया,ढोल पिपही बजाऊ 
पूजब मन सँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाय ।

उठु - उठु कुम्हरा हो भइया,दियौ कोशिया बनाई ,कुड़बार हाथी बनाऊ 
पूजब मन सँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाय ।

उठु - उठु जोलहा हो भईया,आरतक पात बनाऊ , आओर बद्धी बनाऊ
पूजब मनसँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाय ।

उठु - उठु कमरा(बढ़ई )हो भईया,दियौ सांचा बनाई 
पूजब मन सँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाय ।

उठु - उठु तेलिया हो भईया,दियौ तेल पेड़ाई 
पूजब मन सँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाय ।

उठु - उठु हलुवाईया हो भईया,दियौ मधुर बनाई 
पूजब मन सँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाई ।

उठु - उठु गुअरबा हो भईया,दियौ दुधवा दुहाई 
पूजब मन सँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाई ।

उठु - उठु मलिया हो भइया,फूलक माला बनाऊ 
पूजब मन सँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाय ।

उठु - उठु कुजड़ा हो भइया,दियौ सजमनि तोराई 
पूजब मन सँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाय ।

उठु - उठु बनियाँ हो भईया,दियौ सौदा अनाई 
पूजब मन सँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाय ।

उठु - उठु धानुक हो भईया,दियौ घाट बनाई ,दियौ अंगना निपाय 
पूजब मन सँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाय ।

उठु - उठु कोइरी हो भइया,अल्हुआ सुथनी कोड़ाऊ ,सभ फल लए आऊ 
पूजब मन सँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाय ।

सभ बरण मिलि आबू,छठिक डलबा सजाऊ 
सभ मिलि चलू पोखरि घाट, 
सभ मिलि पूजू  छठि माई

सभकक सभ मनकामना,संतति कुलपरिबार
आदित्य आओर छठि मईया 
भरता अँचरा हमार ।
भरता अँचरा हमार ।
भरता अँचरा हमार ।

जय छठि मैया  !!!!!
********************
कल्पना झा
२६ .१० . २०१७

--- भगवान भास्कर के समर्पित एहि पोस्ट में 
हम किछु अनुचित बातक चर्च केलहुँ अछि
किनको आहत करबाक कोनो उद्येश्य नहि
मात्र  सभक आँखि खोलबाक एगो प्रयास
जाति पातिक भेद जखन भगवाने नहि करैत छथि त अनेरे 
हम सभ कियेक ..........

सोमवार, 13 नवंबर 2017

भटकन

जीवन एहन भूल-भुलैया
जाहि मे आदमी भटकैत अछि
त' भटकिते रहि जाईत अछि
भ' सकैत छै
ओकरा भटकहे मे आनन्द होए
तैं ने ओकरा
जीवनक मुख्य द्वार सँ
भटक'क लेल रास्ता भेट जाईत छैक
ओ स्वयं
मकड़ा जाल बुनि लैत अछि
स्वयं फंसि जाईत अछि
मुदा
जल्दिये एहसास होइत छैक
घुटनक, तनाबक आ कुंठाक
तत्पश्चात
छटपटाय लगैत अछि
शांतिक तालाश मे
भटकन सँ निकलबाक लेल। 

कोनो तरहक भूख होए
प्राणीमात्रकें उत्तेजित क' दैत छैक
आ अभाबें
भटक' लगैत अछि
भिखारी जकां, अपराधि जकां
भूख कथुक होए
जखन, अति भ' जाइछ
त'
ओकरा राक्षस बना दैत छैक 
ओकर मानसिकताक सन्तुलन 
खराब भ' जाईत छैक
ओकर जीवन मे उथल - पुथल 
होमय लगैत छैक
आ जीवन पर्यन्त भेटैछ
मात्र 'भटकन' ।
© संजय झा 'नागदह'

आगामी विश्वपुस्तक मेला - जनवरी 2018

आगामी विश्वपुस्तक मेला सम्बंधी एक टा सूचना फेर देबय चाहब। 

जनवरी 2018 में घोषित विश्व पुस्तक मेला में छब्बीस वर्ष में पहिल बेर मैथिली के लेल प्रतिबद्ध एक स्टाल रहत जाहि में मैथिली चहकती, सम्मानित हेती आ आर बहुतो किछ। मैथिली प्रकाशक, लेखक अपन पोथीक प्रदर्शन आ विक्रय लेल csts.ind@gmail.com पर पत्राचार क सकैत छथि वा सम्पर्क क सकैत छथि। 
जे कोनो मैथिली लेखक सुदूर गाम देहात में रहि मुख्यधारा से अलग छथि कृपा क हुनका सब सौं सम्पर्क केल जाऊ. कोशिश रहे जे मैथिली के कोनो किताब छूटय नै।

किछ मित्र आ श्रेष्ठ सब द्वारा किछ और नीक काज सब के कोशिश छै अहि मेला में। आगाँ सूचना भेटबे करत।

कोनो तरहक परेशानी में हमरो सौं सम्पर्क भ सकैया।
अपन पोथी एहि पता पर पठा सकैत छी -
Savita Jha Khan
BE - 7B DDA Flats,
Munirika, New Delhi - 110067

धन्यवाद आ अग्रिम शुभकामना समेत
अपनेक प्रवीण
९६४३२०८३००

शनिवार, 11 नवंबर 2017

हम मूर्ख समाजक वाणी छी

|| हम  मूर्ख  समाजक वाणी छी || 
हम  मुर्ख समाजक वाणी  छी  | 
ज्ञाता जन छथि सदय कलंकित 
हमहीं  टा    बस   ज्ञानी    छी || 
                     हम  मुर्ख ---  || 
रामचंद्र    के   स्त्री    सीता  
तकरो      कैल    कलंकित  | 
कयलनि डर सं अग्नि परीक्षा 
भेला    ओहो    शसंकित    || 
एक्कहि  ठामे  गना दैत  छी 
सुर   नर   मुनि  जे   ज्ञानी | 
हम कलंकित सब  के कयलहुँ 
देखू      पलटि     कहानी  ||  
बुद्धिक-बल   तन  हीन  भेल 
बस आप  नौने  सैतानी छी | 
                  हम  मुर्ख ---|| 
बेटा  वी. ए. बैल हमर अछि 
हम   फुइल    कय  तुम्मा  | 
नै  केकरो  सँ  हम  बाजै छी 
बाघ   लगै    छी    गुम्मा  || 
अनकर  बेटा   कतबो बनलै 
 रहलै       त         अधलाहे | 
अगले    दिन उरैलहुँ  हमहीं 
कतेक    पैघ     अफवाहे  || 
अपनहि मोने,अपने उज्ज्वल 
बस   हम   सब  परानी  छी | 
                   हम  मुर्ख ---  ||   
बाहर  के कुकरो  नञि पूछय 
गामक       सिंह       कहबी  | 
परक    प्रशंसा  पढ़ि  पेपर में 
मूँह    अपन     बिचकावी   || 
सदय इनारक फुलल  बेंग सन 
रहलों        एहन        समाज  |
आनक   टेटर  हेरि  देखय लहुँ 
अप्पन       घोलहुँ       लाज | | 
अधम मंच  पर बैसल हम सब 
पंडित  जन  मन  माणि  छी | 
                        हम  मुर्ख --- ||  
गामक    हाथी  के  लुल्कारी  
जहिना      कुकर     भुकय  | 
बाहर   भले  देखि कय हमर 
प्रभुता    पर   में     थुकय  || 
अतय   सुनैने  हैत ज्ञाण की 
वीघर  छी   कानक     दुनू  |
 कोठी  बिना अन्न केर बैसल 
ओकर     मुँह    की    मुनू  || 
हम  आलोचक   पैघ सब सँ 
हमहीं     टा      अनुमानी  || 
                 हम  मुर्ख --- || 
माली  पैसथि  पुष्प  वाटिका 
सिंचथि        तरुवर       मूल | 
पंडित   पैसथि  पुष्प  वाटिका 
लोढथि      सुन्दर      फूल  | | 
लकरिहार  जन  लकड़ी  लाबय 
चूइल्ह       जेमबाय      गामें  |
 सूअर    पैसय    पुष्प  वाटिका 
विष्ठा         पाबय       ठामे  || 
जे अछि  इच्छु  जकर तेहन से 
दृष्टि      ताहि    पर     डारय | 
मूर्खक  हाथ  मणि अछि पाथर 
ज्ञानी       मुकुट      सिधारय  || 
"रमण " वसथु जे एहि समाज में 
मर्दो    बुझू      जनानी      छी  | 
हम   मुर्ख समाजक  वाणी  छी 
                       हम  मुर्ख ---|| 
 रचनाकार -:


रेवती रमन झा "रमण " 
गाम- जोगियारा पतोंर दरभंगा ।
मो - 9997313751 

बेटीक जन्म - कमलेश प्रेमेन्द्र


बेटी-  बेटी -  बेटी     भेलै,
सगरो मचलै दुखक शोर।
मायक मोन छोट भ'गेलै,
फिफरी परलै बापक ठोर।
केहन कपार भेल बेटा केँ,
 अभागलि सँ बियाह भेलै।
दैबो केँ  नै  ऐहन    चाही,
पोताक मनोरथ नै पुरलै।
ई कहि,बाबा केँ मुँह लटकि गेलै,
दाइ केँ  आँखि सँ खसलै  नोर।
बेटी -  बेटी-   बेटी   भेलै,
सगरो  मचलै दुखक  शोर।
की बेटी ऐहन अभागलि होई छै ,
जन्में   सँ   सभ  कानै   छै।
बेटी बिना  श्रृष्टि नै  चलतै 
से त'   सभ  कियो जानै छै।
बेटी होई  छै  घरक  लक्ष्मी,
जुनि बनियौ औकरा लेल कठोर।
बेटी -  बेटी -   बेटी     भेलै,
 सगरो   मचलै  दुखक   शोर।
बेटी   नहि  अभिशाप   थीक, 
ओ   थीक  ईश्वरक   वरदान।
घरक   इज्जत  प्रतिष्ठा संगे
माय   बापक    बढबै    मान।
जाहि   घर     बेटी   जनमलै,
ओ      घर      भेलै    इजोर।
बेटी-    बेटी-    बेटी     भेलै ,
सगरो   मचलै    दुखक शोर ।
बेटा-बेटी मे जुनि अन्तर बुझियौ,
बेटियो   के    दियौ    सम्मान।
की छै ओकर अपन अहि जग मे,
एक दिन अपनो भ' जायत दान।
बेटी के जुनि करियौ अपमान,
कर जोड़ि  लगै छी सभ केँ गोर।
 प्रेमेन्द्र   लगै छैथ सभ केँ गोर
बेटी -    बेटी -   बेटी    भेलै,
सगरो   मचलै    दुखक  शोर,
मायक   मोन छो ट भ'गेलै,
फिफरी   परलै    बापक  ठोर।
रचित -
कमलेश प्रेमेन्द्र
आहपुर-दामोदरपुर,बेनीपट्टी 
मधुबनी , मिथिला , बिहार 

शुक्रवार, 10 नवंबर 2017

मंच उद्घोषण रोजगारक एक सुन्दर विकल्प

परिचयः मंच उद्घोषक पं. कमलेश प्रेमेन्द्र
जेना-जेना मिथिलाक लोक मे पुनः अपन मूल संपदा बौद्धिकता तथा साहित्य-सृजनक संग मैथिलत्व केर प्रवेश फेरो जगह पाबय लागल छैक तहिना-तहिना हरेक गाम-ठाम मे आम लोक भाषा-संस्कार-शिक्षा-सभ्यता-सौहार्द्रताक संरक्षण-संवर्धन-प्रवर्धन लेल एकजुटता सँ भिन्न-भिन्न कार्यक्रम सब करय लागल छथि। आब दुर्गा पूजा हो या दिपावली-काली-पूजा या छैठ या बसंतोत्सव या होली या चैती दुर्गा – सब अवसरपर गाम-गाम मे मैथिली मंच सजय लागल अछि आर हरेक मंच केँ सुर्हियायल सही दिशा मे संचालन करैत कार्यक्रम केँ पूरा करब अत्यन्त जरुरी होएत छैक। ई विचार दामोदरपुर (बेनीपट्टी) – मधुबनी निवासी युवा पं. कमलेश प्रेमेन्द्र रखैत मैथिली जिन्दाबाद मार्फत अपन परिचिति आ अभियान केर प्रसार हेतु अनुरोध केलनि अछि।
एखन धरि ७ विषय सँ एमए पास छी, आगाँ आरो अध्ययन कय रहल छी। एलएलबी, बीएड, जर्नलिज्म, डीसीए, डीएफए व अन्य – जाहि विधा मे अपन बौद्धिकता केँ बढेबाक अवसर चूकैत नहि छी। पेशा सँ शिक्षक छी। शख कविता आ कहानी लिखब अछि। मैथिली मंच केर उद्घोषणा बड पैघ काज होएत छैक, बहुत ज्ञानवान लोक मात्र मंच सम्हारि सकैत अछि। कारण मिथिला मे पंडित आ पांडित्य कतेक प्रखर छैक से किनको सँ नुकायल नहि अछि। एको रत्ती – कनियो टा गलती भेल त लोक थू-थू कय दैछ एतय। सहियो बात मे दस चिरा आ बीस फार बनेबाक चिरौरी तर्क कएनिहार मिथिला मे जैंह-तैंह भेट जाएत छथि। एहेन अवस्था मे अपन विशिष्ट अध्ययन केर चलते नीक मंच उद्घोषक केर रूप मे हमर परिचिति अछि। – पंडित कमलेश प्रेमेन्द्र जनतब दैत कहलैन।
एखन धरि कतेक अनुभव समेटलहुँ? एहि प्रश्नक उत्तर मे प्रेमेन्द्र कहैत छथि, ७७ टा नाटक केर मंचन कय चुकल छी, जाहि मे ८ गो नाटक मे निर्देशनक काज सेहो केलहुँ। ९ गोट जागरण मंचक उद्घोषक आर ५० सँ ऊपर शिक्षा सम्बन्धी विभिन्न कार्यक्रम मे मंच संचालनक अनुभव अछि।”
कमलेश प्रेमेन्द्र मैथिली भाषा लेल किछु विशेष करबाक सोच बनौने छथि। लेखन मे हाथ भांजैत आबि रहल छथि, परन्तु भाषा व शैली मे आरो प्रखरता अनबाक लेल गुरुक खोजी एखनहु कय रहला अछि। ओ कहैत छथि जे मैथिली मे लिखलाक बाद एकर प्रभाव पाठक पर केहेन पड़ैत अछि से बुझय लेल प्रश्न आ जिज्ञासा लगले रहि जाएत अछि। मैथिली जिन्दाबाद केर संपादक प्रवीण नारायण चौधरी सँ सल्लाह करैत मैथिली भाषा ओ साहित्य केर जे प्रयास मधुबनी जिला मुख्यालय मे स्रष्टा अजित आजाद, दिलीप कुमार झा, आदिक अभियान मे सहभागी बनू कहलापर आगाँ ओहि अभियान मे समय देबाक बात गछैत छथि। मैथिली जिन्दाबाद केर तरफ सँ प्रेमेन्द्र केर उज्ज्वल भविष्य लेल शुभकामना आर ई निस्तुकी बात छैक जे मंच उद्घोषक केर कार्य मे एखन धरि कतेको विद्वान् वक्ता लोकनि नीक रोजी सेहो कमाएत छथि ई मनन करबाक सन्देश अछि।
प्रेमेन्द्रक एहि रचनाक संग एहि परिचय केर विराम दैत छीः
बेटीक जन्म
बेटी बेटी बेटी भेलै सगरो मचलै दुखक शोर,
मायक मोन छोट भ गेलै फिफरी परलै बापक ठोर।
केहन कपार भेल बेटा के अभागलि सँ बियाह भेलै,
दैबो के नहि ऐहन चाही पोताक मनोरथ नै पुरलै।
ई कहि,
बाबा के मुँह लटकि गेलै दाई के आँखि सँ खसलै नोर।
बेटी बेटी बेटी भेलै सगरो मचलै दुखक शोर————
की बेटी ऐहन अभागलि होई छै जन्में सँ सब कानै छै,
बेटी बिना श्रृष्टि नै चलतै से त सब कियो जानै छै।
बेटी होई छै घरक लक्ष्मी जुनि बनियौ औकरा लेल कठोर।
बेटी बेटी बेटी भेलै सगरो मचलै दुखक शोर———–
बेटी नहि अभिशाप थीक ओ थीक ईश्वरक वरदान,
घरक इज्जत प्रतिष्ठा संगे माय बापक बढबै मान।
जाहि घर बेटी जन्मलै ओ घर भेलै इजोर।
बेटी बेटी बेटी भेलै सगरो मचलै दुखक शोर————–
बेटा-बेटी में जुनि अन्तर बुझियौ बेटियो के दियौ सम्मान,
की छै ओकर अप्पन अहि जग में एक दिन अपनो भ जेत दान।
बेटी के जुनि करियौ अपमान कर् जोड़ि लगै छी सबके गोर।
प्रेमेन्द्र लगै छैथ सबके गोर
बेटी बेटी बेटी भेलै सगरो मचलै दुखक शोर,
मायक मोन छोट भ गेलै फिफरी परलै बापक ठोर।
लिंक : http://www.maithilijindabaad.com/?p=8611
साभार : मैथिली जिंदाबाद वेब पोर्टल 

मंगलवार, 7 नवंबर 2017

अगहन मास

 ।। अगहन मास ।।


आयल    अगहन   सेर   पसेरी
मूँसहुँ         बीयरि       धयने।
     जन  बनि हारक मोनमस्त अछि
    लोरिक      तान         उठौने ।।  

भातक दर्शन पुनि पुनि परसन
होइत        कलौ    बेरहटिया ।
भोरे  कनियाँ  कैल   उसनियाँ 
परल      पथारक     पटिया ।।

   फटकि-फटकि खखड़ा मुसहरनी
खयलक      मुरही        चूड़ा ।
नार पुआरक कथा कोन अछि
वड़द    ने     पूछय     गुड़ा ।।

चारु    कात   धमाधम   उठल
जखनहि    उगल     भुरुकवा ।
 साँझक साँझ परल  मुँह  फुफरी
तकरो      मुँह     उलकुटवा ।।

रचयिता
रेवती रमण झा "रमण"
मो - 9997313751