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शनिवार, 18 नवंबर 2017

मिथिलाक शान बसुआरा गाम

दरभंगा अईछ मिथिलाक शान 
    जई मे बसैत अछि हमर प्राण
 स्वर्ग स सुन्दर ग्राम अछि हमर
     जेकरा कहैत मिथिलाक शान
नाम अछि ओकर बसुआरा गाम 
     जई स उखरल उज्जवल नाम
 करैत अहाँ सबके प्रणाम 
     कहू अहाँ किछू कहब की
कहब की हम देखने छी हाँ यो 
       हम बजै छी उज्जवल जी
 ओलक सब्जी खा क रहै छी 
        हमरा लग की बात छोड़ई छी
  अहाँ करी ओल पसंद
       तै नई करैत अछी महिला तंग
  आइब देखू बसुआरा गाम 
             स्वर्ग स सुन्दर अछि ई गाम 
 जई मे होईत अछि राजा आम 
             अहाँ खाईत छी अमावट
   हमरा लग की करब जमावट
            हम करै छी वर्णन शेष
        पूरा मिथिला दिअ संदेश ।।
लेखक -:

नाम - उज्जवल कुमार झा 
पिता का नाम- श्री शम्भू नाथ झा 
पता- बसुआरा दरभंगा बिहार 
पुरस्कार-  ऑल इंडिया राइटिंग कम्पीटीशन्स 
(पेन इट टू विन इट जनवरी  2017) 
के विजेता, और  प्रतिभा सम्मान विजेता 

संकट मे साथ भगवानक हाथ

घुईर देखू  मिथिला के हाल

बाइढ़ स मिथिला भेल बेहाल
जे देला संकट मे साथ 
ओ बनला भगवानक हाथ
एम.एस.यू. के नाम अछि आगू
सरकारो किछू राशन पठाबू
अठारह जिला मे टीम बनई अइछ
दिअ अई मे मिलजुइल संग
तखने अपनो मिथिला बनत दुनिया के रे विकसित अंग
क्रांतिकारी सेनानी मिल क करई छथि सबके प्रसन्न
अई संकट मे घर-घर जा क दई छथि कपड़ा औरो अन्न
मिथिला के रे रोगी सबके होइक मिथले मे ईलाज
अई लेल सब सेनानी मिल क उठेला एम्स लेल आवाज
एम.एस.यू. के के छथि सेनानी कहत हिनकर सबहक काज
उज्जवल अछि मिथिला के बेटा हरिदम एम.एस.यू के साथ 
-----------:--
नाम - उज्जवल कुमार झा 
पिता का नाम- श्री शम्भू नाथ झा 
पता- बसुआरा दरभंगा बिहार 
पुरस्कार-  ऑल इंडिया राइटिंग कम्पीटीशन्स 
(पेन इट टू विन इट जनवरी  2017) के विजेता, 
और  प्रतिभा सम्मान विजेता 

पावस पीड़


राति  पावस  घोर  घन  गर्जन
दामिनि दमकि डराबय |
वैरिन  पवन  संग  दादुर  बोल 
अंतस   पीड़   बढ़ाबय ||
            प्रीतम  वास परदेस रे--
षोड़स  वसन्त  रंग दर्शन पारे
युगल गिरवर तनधारै  |
पवन  पयोधरि  वसन उघारय 
अगिन दहन मन जारै ||
               के  देत सजन  उदेश रे---
मानिनि  मन  बड अभिभानी
अंतस हेलि हिलोरय |
सकल  विकलता नैने  नाचय
विरहे  प्रीत घोरय ||
            मन दर्शन हरि अशेष रे ---
हिरदय  आँगन गोकुल मथुरा 
राधा वृन्दावन माँझे |
वन वन मन डोलय सदिखन
वाँछा  दरशन साँझे ||
              धरू प्रीतम नटवर वेष रे- 

आनंदक आभा चहुँ ओर

लेखक : पूर्णेन्दु झा 'बख्शी'

उदयाचलमे अरुणादित्यक                                                                                  
           दर्शन जखने तखने भोर!
आयल भोरहु सहजहि तहिना
           आनंदक आभा चहुँ ओर!!
आनंदित भ' अपन नीड़सँ
             बाहर खेचर करइछ सोर !
सोर मचौने आनि पसारल
              आनंदक आभा चहुँ ओर!!
जागय हमरहु दुनियाँ तहिना
          मानि अपन ई अभिनव भोर!
मुदित प्रभाकरसँ आयल अछि
              आनंदक आभा चहुँ ओर !!
साम्राज्यहु जे राखि बनौने
                दुष्ट कुहेस बड़े घनघोर!
दुष्टक अंतो पाबि सुनिश्चित
              आनंदक आभा चहुँ ओर!!
रुण्ड-मुण्ड भेल दुष्टहु तखने
            भेल उमंगक बड़ हिलकोर!
 अहिना जगमे होअय तहिसँ
              आनंदक आभा चहुँ ओर !!
शांतिबयार बहय भोरहिसँ
              डोलय ई मन तहिसँ जोर!
भाग्य सूर्य तन-मनकेँ जहिसँ
              आनंदक आभा चहुँ ओर!!
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शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

बउआ के हत्यारा के आब फाँसी चढ़ा दिअ

अत्याचार के अति भ गेल आबो सजा दिअ

हयो मिथिला पड़ल विपति मे सब मिल क् बचा लिअ

हम्मर बउआ आँखिक तारा,छल हम्मर ओ फूल यो

किया पठेलउ ओइदिन हमहूँ ओई कातिल स्कूल यो
पूरा दुनिया मांगि रहल बस न्याय दिया दिअ
हयो बउआ के हत्यारा के आब जिंदा जला दिअ
सब सेनानी न्याय मांगई लेल गेला ओई स्कूल यो
प्रशासन के बुद्धी देखी गेला दुख मे डुईब यो
सीबीआई स् जाँच  कराबू कातिल के पहीने पकराबू
आ ओई पापी अपराधी के कनी हमरो चिन्हा दिअ
हयो बउआ के हत्यारा के आब फाँसी चढ़ा दिअ
आबो बढू आगू सब मिल एम.एस.यू के साथ यो
अत्याचार के खत्म करई लेल बढ़ाबू अप्पन हाथ यो
मिथिला क्षेत्र आ छात्रक लेल बस न्याय दिया दिअ
हयो बउआ के हत्यारा के आब जिंदा जला दिअ
हयो प्रद्यूम्न के हत्यारा के आब फाँसी चढ़ा दिअ  ।। 

- :-

नाम - उज्जवल कुमार झा 
पिता का नाम- श्री शम्भू नाथ झा 
पता- बसुआरा दरभंगा बिहार 
पुरस्कार-  ऑल इंडिया राइटिंग कम्पीटीशन्स 
(पेन इट टू विन इट जनवरी  2017) के विजेता,
 और  प्रतिभा सम्मान विजेता 

सहज प्रकृति अनुकूल

बाड़ीमे बड़ हरियर लत्ती
                               लत्तीमे बड़ फूल छै!

हरियर गाछहु फूलसुशोभित
                       सहज प्रकृति अनुकूल छै!!
झूमि रहल छै हरियर झाड़ी
                               झूमै तकरो फूल छै!
झूमब,झलकब,रहब फुलायल
                       सहज प्रकृति अनुकूल छै!!
पीयर,उज्जर,लाल,गुलाबी
                              रंग-विरंगक फूल छै !
मनमोहक जे फूल गुलाबक
                             संगहि तकरो शूल छै!!
रहब सुरक्षित शूलक संगहु
                             तहिमे नहिओं भूल छै!
अप्पन जिनगी राखि बचायब
                        सहज प्रकृति अनुकूल छै!!
निर्विकार मोनहु फूलहि सन
                            बनल सुसंगतिमूल छै !
मोनहि मोनहु मोहने राखब
                        सहज प्रकृति अनुकूल छै!!
मोन बनय मनमीतहु तहिना
                           जहिना मीतहि फूल छै!
मोन मनोहर राखि बचायब
                        सहज प्रकृति अनुकूल छै!!
पाबि सहारा लिपटि बढ़ब नित
                             नेहिल मनसमतूल छै!
नेहिल मन सँ करब समुन्नति
                        सहज प्रकृति अनुकूल छै!!
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लेखक : पूर्णेन्दु कुमार झा

संपर्क
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पूर्णेन्दु कुमार झा
ग्राम+पत्रालय:हरिपुर बख्शी टोल
भाया:कलुआही
जिला:मधुबनी
बिहार-847229
मो.नं.:9905860342

गुरुवार, 16 नवंबर 2017

अबला नारि --- कल्पना झा


 
पुरातनि सँ सदति नारि , अपन कर्तव्य करैत छथि
आख्यानों में ई ब्याख्या  , मनीषि  सभ  केने छथि 
अगर भूलो सँ जौं नारि , नहि करती कर्म ओ अप्पन 
त  ई  श्रृष्टि कोना बाँचत , एतेक  त सभ  जानए छी
अहिल्या जे शिला बनली , तकर अनुमान अछि किनको
छललि गेली ओ पुरुषे सँ , भेलनि  उद्धार  पुरुषे  सँ
मुदा नारिक ई पीड़ा , नहि बुझलक आई तक कीयो
रचल किनकर ई विधना छी , बुझाओत ई बुझौअल के
स्वयंवर जीति के अनला , कहाबैत छला धनुर्धर जे
पति पाँचो धुरंधर छलनि , सगर संसार जानैत छी
छलल अपने सँ  ओ गेली , जे अबला नारि बनि गेली
जे अग्नि पुत्री छली ज्वाला , लगाओल दाव पर गेली
बाँचत सम्मान कोना के , कठिन ई प्रश्न अछि सोचू
मिझाओल दीप जौं राखब , भेटत उजियार कोना के
हवस के भेंट जौं चढ़ती , सदति श्रृष्टि के निर्मात्री
तखन श्रृष्टि कोना बाँचत , एतेक त सभ जानैत छी
लेखक -:
 कल्पना झा 
१६.  ११. २०१७ 

छठिक ओरियाओन गीत


उठु -उठु ब्राह्मण पंडित,दियौ पोथिया उचारि पूजब मन सँ आदित्य के, आदित्य होऊ ने सहाय ।
उठु - उठु डोमबा हो भइया,दियौ डगरा बनाय 
पूजब मन सँ आदित्य के,
आदित्य होऊ ने सहाय ।

उठु - उठु चमरा हो भइया,ढोल पिपही बजाऊ 
पूजब मन सँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाय ।

उठु - उठु कुम्हरा हो भइया,दियौ कोशिया बनाई ,कुड़बार हाथी बनाऊ 
पूजब मन सँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाय ।

उठु - उठु जोलहा हो भईया,आरतक पात बनाऊ , आओर बद्धी बनाऊ
पूजब मनसँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाय ।

उठु - उठु कमरा(बढ़ई )हो भईया,दियौ सांचा बनाई 
पूजब मन सँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाय ।

उठु - उठु तेलिया हो भईया,दियौ तेल पेड़ाई 
पूजब मन सँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाय ।

उठु - उठु हलुवाईया हो भईया,दियौ मधुर बनाई 
पूजब मन सँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाई ।

उठु - उठु गुअरबा हो भईया,दियौ दुधवा दुहाई 
पूजब मन सँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाई ।

उठु - उठु मलिया हो भइया,फूलक माला बनाऊ 
पूजब मन सँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाय ।

उठु - उठु कुजड़ा हो भइया,दियौ सजमनि तोराई 
पूजब मन सँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाय ।

उठु - उठु बनियाँ हो भईया,दियौ सौदा अनाई 
पूजब मन सँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाय ।

उठु - उठु धानुक हो भईया,दियौ घाट बनाई ,दियौ अंगना निपाय 
पूजब मन सँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाय ।

उठु - उठु कोइरी हो भइया,अल्हुआ सुथनी कोड़ाऊ ,सभ फल लए आऊ 
पूजब मन सँ आदित्य के 
आदित्य होऊ ने सहाय ।

सभ बरण मिलि आबू,छठिक डलबा सजाऊ 
सभ मिलि चलू पोखरि घाट, 
सभ मिलि पूजू  छठि माई

सभकक सभ मनकामना,संतति कुलपरिबार
आदित्य आओर छठि मईया 
भरता अँचरा हमार ।
भरता अँचरा हमार ।
भरता अँचरा हमार ।

जय छठि मैया  !!!!!
********************
कल्पना झा
२६ .१० . २०१७

--- भगवान भास्कर के समर्पित एहि पोस्ट में 
हम किछु अनुचित बातक चर्च केलहुँ अछि
किनको आहत करबाक कोनो उद्येश्य नहि
मात्र  सभक आँखि खोलबाक एगो प्रयास
जाति पातिक भेद जखन भगवाने नहि करैत छथि त अनेरे 
हम सभ कियेक ..........

सोमवार, 13 नवंबर 2017

भटकन

जीवन एहन भूल-भुलैया
जाहि मे आदमी भटकैत अछि
त' भटकिते रहि जाईत अछि
भ' सकैत छै
ओकरा भटकहे मे आनन्द होए
तैं ने ओकरा
जीवनक मुख्य द्वार सँ
भटक'क लेल रास्ता भेट जाईत छैक
ओ स्वयं
मकड़ा जाल बुनि लैत अछि
स्वयं फंसि जाईत अछि
मुदा
जल्दिये एहसास होइत छैक
घुटनक, तनाबक आ कुंठाक
तत्पश्चात
छटपटाय लगैत अछि
शांतिक तालाश मे
भटकन सँ निकलबाक लेल। 

कोनो तरहक भूख होए
प्राणीमात्रकें उत्तेजित क' दैत छैक
आ अभाबें
भटक' लगैत अछि
भिखारी जकां, अपराधि जकां
भूख कथुक होए
जखन, अति भ' जाइछ
त'
ओकरा राक्षस बना दैत छैक 
ओकर मानसिकताक सन्तुलन 
खराब भ' जाईत छैक
ओकर जीवन मे उथल - पुथल 
होमय लगैत छैक
आ जीवन पर्यन्त भेटैछ
मात्र 'भटकन' ।
© संजय झा 'नागदह'

आगामी विश्वपुस्तक मेला - जनवरी 2018

आगामी विश्वपुस्तक मेला सम्बंधी एक टा सूचना फेर देबय चाहब। 

जनवरी 2018 में घोषित विश्व पुस्तक मेला में छब्बीस वर्ष में पहिल बेर मैथिली के लेल प्रतिबद्ध एक स्टाल रहत जाहि में मैथिली चहकती, सम्मानित हेती आ आर बहुतो किछ। मैथिली प्रकाशक, लेखक अपन पोथीक प्रदर्शन आ विक्रय लेल csts.ind@gmail.com पर पत्राचार क सकैत छथि वा सम्पर्क क सकैत छथि। 
जे कोनो मैथिली लेखक सुदूर गाम देहात में रहि मुख्यधारा से अलग छथि कृपा क हुनका सब सौं सम्पर्क केल जाऊ. कोशिश रहे जे मैथिली के कोनो किताब छूटय नै।

किछ मित्र आ श्रेष्ठ सब द्वारा किछ और नीक काज सब के कोशिश छै अहि मेला में। आगाँ सूचना भेटबे करत।

कोनो तरहक परेशानी में हमरो सौं सम्पर्क भ सकैया।
अपन पोथी एहि पता पर पठा सकैत छी -
Savita Jha Khan
BE - 7B DDA Flats,
Munirika, New Delhi - 110067

धन्यवाद आ अग्रिम शुभकामना समेत
अपनेक प्रवीण
९६४३२०८३००

शनिवार, 11 नवंबर 2017

हम मूर्ख समाजक वाणी छी

|| हम  मूर्ख  समाजक वाणी छी || 
हम  मुर्ख समाजक वाणी  छी  | 
ज्ञाता जन छथि सदय कलंकित 
हमहीं  टा    बस   ज्ञानी    छी || 
                     हम  मुर्ख ---  || 
रामचंद्र    के   स्त्री    सीता  
तकरो      कैल    कलंकित  | 
कयलनि डर सं अग्नि परीक्षा 
भेला    ओहो    शसंकित    || 
एक्कहि  ठामे  गना दैत  छी 
सुर   नर   मुनि  जे   ज्ञानी | 
हम कलंकित सब  के कयलहुँ 
देखू      पलटि     कहानी  ||  
बुद्धिक-बल   तन  हीन  भेल 
बस आप  नौने  सैतानी छी | 
                  हम  मुर्ख ---|| 
बेटा  वी. ए. बैल हमर अछि 
हम   फुइल    कय  तुम्मा  | 
नै  केकरो  सँ  हम  बाजै छी 
बाघ   लगै    छी    गुम्मा  || 
अनकर  बेटा   कतबो बनलै 
 रहलै       त         अधलाहे | 
अगले    दिन उरैलहुँ  हमहीं 
कतेक    पैघ     अफवाहे  || 
अपनहि मोने,अपने उज्ज्वल 
बस   हम   सब  परानी  छी | 
                   हम  मुर्ख ---  ||   
बाहर  के कुकरो  नञि पूछय 
गामक       सिंह       कहबी  | 
परक    प्रशंसा  पढ़ि  पेपर में 
मूँह    अपन     बिचकावी   || 
सदय इनारक फुलल  बेंग सन 
रहलों        एहन        समाज  |
आनक   टेटर  हेरि  देखय लहुँ 
अप्पन       घोलहुँ       लाज | | 
अधम मंच  पर बैसल हम सब 
पंडित  जन  मन  माणि  छी | 
                        हम  मुर्ख --- ||  
गामक    हाथी  के  लुल्कारी  
जहिना      कुकर     भुकय  | 
बाहर   भले  देखि कय हमर 
प्रभुता    पर   में     थुकय  || 
अतय   सुनैने  हैत ज्ञाण की 
वीघर  छी   कानक     दुनू  |
 कोठी  बिना अन्न केर बैसल 
ओकर     मुँह    की    मुनू  || 
हम  आलोचक   पैघ सब सँ 
हमहीं     टा      अनुमानी  || 
                 हम  मुर्ख --- || 
माली  पैसथि  पुष्प  वाटिका 
सिंचथि        तरुवर       मूल | 
पंडित   पैसथि  पुष्प  वाटिका 
लोढथि      सुन्दर      फूल  | | 
लकरिहार  जन  लकड़ी  लाबय 
चूइल्ह       जेमबाय      गामें  |
 सूअर    पैसय    पुष्प  वाटिका 
विष्ठा         पाबय       ठामे  || 
जे अछि  इच्छु  जकर तेहन से 
दृष्टि      ताहि    पर     डारय | 
मूर्खक  हाथ  मणि अछि पाथर 
ज्ञानी       मुकुट      सिधारय  || 
"रमण " वसथु जे एहि समाज में 
मर्दो    बुझू      जनानी      छी  | 
हम   मुर्ख समाजक  वाणी  छी 
                       हम  मुर्ख ---|| 
 रचनाकार -:


रेवती रमन झा "रमण " 
गाम- जोगियारा पतोंर दरभंगा ।
मो - 9997313751 

बेटीक जन्म - कमलेश प्रेमेन्द्र


बेटी-  बेटी -  बेटी     भेलै,
सगरो मचलै दुखक शोर।
मायक मोन छोट भ'गेलै,
फिफरी परलै बापक ठोर।
केहन कपार भेल बेटा केँ,
 अभागलि सँ बियाह भेलै।
दैबो केँ  नै  ऐहन    चाही,
पोताक मनोरथ नै पुरलै।
ई कहि,बाबा केँ मुँह लटकि गेलै,
दाइ केँ  आँखि सँ खसलै  नोर।
बेटी -  बेटी-   बेटी   भेलै,
सगरो  मचलै दुखक  शोर।
की बेटी ऐहन अभागलि होई छै ,
जन्में   सँ   सभ  कानै   छै।
बेटी बिना  श्रृष्टि नै  चलतै 
से त'   सभ  कियो जानै छै।
बेटी होई  छै  घरक  लक्ष्मी,
जुनि बनियौ औकरा लेल कठोर।
बेटी -  बेटी -   बेटी     भेलै,
 सगरो   मचलै  दुखक   शोर।
बेटी   नहि  अभिशाप   थीक, 
ओ   थीक  ईश्वरक   वरदान।
घरक   इज्जत  प्रतिष्ठा संगे
माय   बापक    बढबै    मान।
जाहि   घर     बेटी   जनमलै,
ओ      घर      भेलै    इजोर।
बेटी-    बेटी-    बेटी     भेलै ,
सगरो   मचलै    दुखक शोर ।
बेटा-बेटी मे जुनि अन्तर बुझियौ,
बेटियो   के    दियौ    सम्मान।
की छै ओकर अपन अहि जग मे,
एक दिन अपनो भ' जायत दान।
बेटी के जुनि करियौ अपमान,
कर जोड़ि  लगै छी सभ केँ गोर।
 प्रेमेन्द्र   लगै छैथ सभ केँ गोर
बेटी -    बेटी -   बेटी    भेलै,
सगरो   मचलै    दुखक  शोर,
मायक   मोन छो ट भ'गेलै,
फिफरी   परलै    बापक  ठोर।
रचित -
कमलेश प्रेमेन्द्र
आहपुर-दामोदरपुर,बेनीपट्टी 
मधुबनी , मिथिला , बिहार 

शुक्रवार, 10 नवंबर 2017

मंच उद्घोषण रोजगारक एक सुन्दर विकल्प

परिचयः मंच उद्घोषक पं. कमलेश प्रेमेन्द्र
जेना-जेना मिथिलाक लोक मे पुनः अपन मूल संपदा बौद्धिकता तथा साहित्य-सृजनक संग मैथिलत्व केर प्रवेश फेरो जगह पाबय लागल छैक तहिना-तहिना हरेक गाम-ठाम मे आम लोक भाषा-संस्कार-शिक्षा-सभ्यता-सौहार्द्रताक संरक्षण-संवर्धन-प्रवर्धन लेल एकजुटता सँ भिन्न-भिन्न कार्यक्रम सब करय लागल छथि। आब दुर्गा पूजा हो या दिपावली-काली-पूजा या छैठ या बसंतोत्सव या होली या चैती दुर्गा – सब अवसरपर गाम-गाम मे मैथिली मंच सजय लागल अछि आर हरेक मंच केँ सुर्हियायल सही दिशा मे संचालन करैत कार्यक्रम केँ पूरा करब अत्यन्त जरुरी होएत छैक। ई विचार दामोदरपुर (बेनीपट्टी) – मधुबनी निवासी युवा पं. कमलेश प्रेमेन्द्र रखैत मैथिली जिन्दाबाद मार्फत अपन परिचिति आ अभियान केर प्रसार हेतु अनुरोध केलनि अछि।
एखन धरि ७ विषय सँ एमए पास छी, आगाँ आरो अध्ययन कय रहल छी। एलएलबी, बीएड, जर्नलिज्म, डीसीए, डीएफए व अन्य – जाहि विधा मे अपन बौद्धिकता केँ बढेबाक अवसर चूकैत नहि छी। पेशा सँ शिक्षक छी। शख कविता आ कहानी लिखब अछि। मैथिली मंच केर उद्घोषणा बड पैघ काज होएत छैक, बहुत ज्ञानवान लोक मात्र मंच सम्हारि सकैत अछि। कारण मिथिला मे पंडित आ पांडित्य कतेक प्रखर छैक से किनको सँ नुकायल नहि अछि। एको रत्ती – कनियो टा गलती भेल त लोक थू-थू कय दैछ एतय। सहियो बात मे दस चिरा आ बीस फार बनेबाक चिरौरी तर्क कएनिहार मिथिला मे जैंह-तैंह भेट जाएत छथि। एहेन अवस्था मे अपन विशिष्ट अध्ययन केर चलते नीक मंच उद्घोषक केर रूप मे हमर परिचिति अछि। – पंडित कमलेश प्रेमेन्द्र जनतब दैत कहलैन।
एखन धरि कतेक अनुभव समेटलहुँ? एहि प्रश्नक उत्तर मे प्रेमेन्द्र कहैत छथि, ७७ टा नाटक केर मंचन कय चुकल छी, जाहि मे ८ गो नाटक मे निर्देशनक काज सेहो केलहुँ। ९ गोट जागरण मंचक उद्घोषक आर ५० सँ ऊपर शिक्षा सम्बन्धी विभिन्न कार्यक्रम मे मंच संचालनक अनुभव अछि।”
कमलेश प्रेमेन्द्र मैथिली भाषा लेल किछु विशेष करबाक सोच बनौने छथि। लेखन मे हाथ भांजैत आबि रहल छथि, परन्तु भाषा व शैली मे आरो प्रखरता अनबाक लेल गुरुक खोजी एखनहु कय रहला अछि। ओ कहैत छथि जे मैथिली मे लिखलाक बाद एकर प्रभाव पाठक पर केहेन पड़ैत अछि से बुझय लेल प्रश्न आ जिज्ञासा लगले रहि जाएत अछि। मैथिली जिन्दाबाद केर संपादक प्रवीण नारायण चौधरी सँ सल्लाह करैत मैथिली भाषा ओ साहित्य केर जे प्रयास मधुबनी जिला मुख्यालय मे स्रष्टा अजित आजाद, दिलीप कुमार झा, आदिक अभियान मे सहभागी बनू कहलापर आगाँ ओहि अभियान मे समय देबाक बात गछैत छथि। मैथिली जिन्दाबाद केर तरफ सँ प्रेमेन्द्र केर उज्ज्वल भविष्य लेल शुभकामना आर ई निस्तुकी बात छैक जे मंच उद्घोषक केर कार्य मे एखन धरि कतेको विद्वान् वक्ता लोकनि नीक रोजी सेहो कमाएत छथि ई मनन करबाक सन्देश अछि।
प्रेमेन्द्रक एहि रचनाक संग एहि परिचय केर विराम दैत छीः
बेटीक जन्म
बेटी बेटी बेटी भेलै सगरो मचलै दुखक शोर,
मायक मोन छोट भ गेलै फिफरी परलै बापक ठोर।
केहन कपार भेल बेटा के अभागलि सँ बियाह भेलै,
दैबो के नहि ऐहन चाही पोताक मनोरथ नै पुरलै।
ई कहि,
बाबा के मुँह लटकि गेलै दाई के आँखि सँ खसलै नोर।
बेटी बेटी बेटी भेलै सगरो मचलै दुखक शोर————
की बेटी ऐहन अभागलि होई छै जन्में सँ सब कानै छै,
बेटी बिना श्रृष्टि नै चलतै से त सब कियो जानै छै।
बेटी होई छै घरक लक्ष्मी जुनि बनियौ औकरा लेल कठोर।
बेटी बेटी बेटी भेलै सगरो मचलै दुखक शोर———–
बेटी नहि अभिशाप थीक ओ थीक ईश्वरक वरदान,
घरक इज्जत प्रतिष्ठा संगे माय बापक बढबै मान।
जाहि घर बेटी जन्मलै ओ घर भेलै इजोर।
बेटी बेटी बेटी भेलै सगरो मचलै दुखक शोर————–
बेटा-बेटी में जुनि अन्तर बुझियौ बेटियो के दियौ सम्मान,
की छै ओकर अप्पन अहि जग में एक दिन अपनो भ जेत दान।
बेटी के जुनि करियौ अपमान कर् जोड़ि लगै छी सबके गोर।
प्रेमेन्द्र लगै छैथ सबके गोर
बेटी बेटी बेटी भेलै सगरो मचलै दुखक शोर,
मायक मोन छोट भ गेलै फिफरी परलै बापक ठोर।
लिंक : http://www.maithilijindabaad.com/?p=8611
साभार : मैथिली जिंदाबाद वेब पोर्टल 

मंगलवार, 7 नवंबर 2017

अगहन मास

 ।। अगहन मास ।।


आयल    अगहन   सेर   पसेरी
मूँसहुँ         बीयरि       धयने।
     जन  बनि हारक मोनमस्त अछि
    लोरिक      तान         उठौने ।।  

भातक दर्शन पुनि पुनि परसन
होइत        कलौ    बेरहटिया ।
भोरे  कनियाँ  कैल   उसनियाँ 
परल      पथारक     पटिया ।।

   फटकि-फटकि खखड़ा मुसहरनी
खयलक      मुरही        चूड़ा ।
नार पुआरक कथा कोन अछि
वड़द    ने     पूछय     गुड़ा ।।

चारु    कात   धमाधम   उठल
जखनहि    उगल     भुरुकवा ।
 साँझक साँझ परल  मुँह  फुफरी
तकरो      मुँह     उलकुटवा ।।

रचयिता
रेवती रमण झा "रमण"
मो - 9997313751 

बुधवार, 1 नवंबर 2017

MAITHILI HANUMAN CHALISH



MAITHILI HANUMAN CHALISA by madan-thakur
Aarti hanuman ji ke , maithili hanuman chalisa se by madan-thakur

  ||  मैथिली  - हनुमान चालीसा  ||
     लेखक - रेवती रमण  झा " रमण "
     ||  दोहा ||
गौरी   नन्द   गणेश  जी , वक्र  तुण्ड  महाकाय  ।
विघ्न  हरण  मंगल करन , सदिखन रहू  सहाय ॥
बंदउ शत - शत  गुरु चरन , सरसिज सुयश पराग ।
राम लखन  श्री  जानकी , दीय भक्ति  अनुराग । ।
 ||    चौपाइ  ||
जय    हनुमंत    दीन    हितकारी ।
यश   वर  देथि   नाथ  धनु  धारी ॥
श्री  करुणा  निधान  मन   बसिया ।
बजरंगी    रामहि    धुन    रसिया ॥
जय   कपिराज  सकल गुण सागर ।
रंग   सिन्दुरिया   सब गुन   आगर  ॥
गरिमा   गुणक  विभीषण  जानल ।
बहुत   रास  गुण  ज्ञान   बखानल  ॥
लीला   कियो   जानि   नयि पौलक ।
की कवि कोविद जत  गुण गौलक ॥
नारद - शारद   मुनि   सनकादिक  ।
चहुँ   दिगपाल    जमहूँ  ब्रह्मादिक ॥
लाल    ध्वजा     तन   लाल  लंगोटा  ।
लाल   देह     भुज    लालहि    सोंटा ॥
कांधे     जनेऊ        रूप     विशाल  ।
कुण्डल      कान     केस    धुँधराल  ॥
एकानन     कपि      स्वर्ण     सुमेरु  ।
यौ      पञ्चानन     दुरमति    फेरु  ।।
सप्तानन      गुण   शीलहि   निधान ।
विद्या     वारिध    वर  ज्ञान  सुजान ॥
अंजनि     सूत    सुनू   पवन कुमार  ।
केशरी      कंत      रूद्र      अवतार   ॥
अतुल    भुजा  बल  ज्ञान अतुल अइ ।
आलसक  जीवन नञि एक पल अइ ॥
दुइ    हजार     योजन   पर  दिनकर ।
दुर्गम   दुसह    बाट  अछि जिनकर ॥
निगलि  गेलहुँ रवि  मधु फल जानि  ।
बाल    चरित  के  लीखत   बखानि  ॥
चहुँ    दिस    त्रिभुवन  भेल  अन्हार ।
जल ,  थल ,  नभचर  सबहि बेकार ॥
दैवे    निहोरा   सँ    रवि   त्यागल  । 
पल  में  पलटि  अन्हरिया भागल  ॥ 
अक्षय   कुमार  के  मारि   गिरेलहुं  ।
लंका     में    हरकंप     मचयलहूँ  ॥
बालिए   अनुज   अनुग्रह   केलहु  ।
ब्राहमण    रुपे    राम मिलयलहुँ  ॥
युग    चारि    परताप    उजागर  ।
शंकर    स्वयंम   दया  के  सागर ॥
सुक्षम  बिकट  आ भीम  रूप धरि ।
नैहि  अगुतेलोहुँ   राम काज करि  ॥
मूर्छित   लखन  बूटी जा  लयलहुँ  ।
उर्मिला     पति     प्राण  बचेलहुँ  ॥
कहलनि   राम   उरिंग  नञि तोर ।
तू  तउ    भाई   भरत  सन  मोर   ॥
अतबे   कहि   दृग   बिन्दू  बहाय  ।
करुणा निधि , करुणा चित लाय ॥
जय   जय   जय बजरंग  अड़ंगी  ।
अडिंग ,अभेद , अजीत , अखंडी ॥
कपि के सिर पर धनुधर  हाथहि ।
राम  रसायन  सदिखन  साथहि ॥
आठो  सिद्धि  नो  निधि वर दान ।
सीय  मुदित  चित  देल हनुमान ॥
संकट    कोन  ने   टरै   अहाँ   सँ ।
के   बलवीर   ने   डरै   अहाँ  सँ  ॥
अधम   उदोहरन , सजनक संग ।
निर्मल -  सुरसरि  जीवन तरंग ॥
दारुण - दुख  दारिद्र् भय मोचन ।
बाटे  जोहि  थकित दुहू  लोचन ॥
यंत्र  - मंत्र   सब  तन्त्र  अहीं छी ।
परमा   नंद  स्वतन्त्र  अहीं  छी  ॥
रामक   काजे   सदिखन  आतुर ।
सीता   जोहि   गेलहुँ   लंकापुर  ॥
विटप   अशोक  शोक  बिच जाय ।
सिय    दुख  सुनल कान लगाय ॥
वो  छथि   जतय ,  अतय  बैदेही ।
जानू   कपीस    प्राण  बिन देही  ॥
सीता  ब्यथा   कथा   सुनि  कान ।
मूर्छित     अहूँ    भेलहुँ  हनुमान ॥
अरे      दशानन     एलो     काल  ।
कहि   बजरंगी    ठोकलहुँ  ताल ॥
छल   दशानन  मति  के आन्हर ।
बुझलक    तुच्छ अहाँ  के  वानर ॥
उछलि   कूदी  कपि  लंका जारल ।
रावणक   सब  मनोबल  मारल  ॥
हा - हा    कार  मचल  लंका   में  ।
एकहि    टा  घर  बचल लंका में  ॥
कतेक    कहू  कपि की -  की कैल ।
रामजीक     काज  सब   सलटैल  ॥
कुमति के काल सुमति सुख सागर ।
रमण ' भक्ति चित करू  उजागर ॥
  ||  दोहा ||
चंचल कपि कृपा करू , मिलि सिया  अवध नरेश  ।
अनुदिन   अपनों    अनुग्रह , देबइ  तिरहुत देश ॥
सप्त    कोटि   महामन्त्रे ,  अभि मंत्रित  वरदान ।
बिपतिक   परल   पहाड़  इ , सिघ्र  हरु  हनुमान ॥

|| 2  ||
          ॥  दुख - मोचन  हनुमान   ॥ 
  जगत     जनैया  ,  यो बजरंगी  ।
  अहाँ      छी  दुख  बिपति  के संगी
  मान  चित  अपमान त्यागि  कउ ,
     सदिखन  कयलहुँ   रामक काज   । 
   संत   सुग्रीव   विभीषण   जी के,   
    अहाँ , बुद्धिक बल सँ  देलों  राज  ॥ 
   नीति  निपुन   कपि कैल  मंत्रना  
    यौ      सुग्रीव   अहाँ    कउ  संगी  
              जगत  जनैया --- अहाँ  छी दुख --

  वन  अशोक,  शोकहि   बिच सीता  
  बुझि   ब्यथा ,  मूर्छित  मन भेल  ।
  विह्बल   चित  विश्वास  जगा  कउ
  जानकी     राम     मुद्रिका    देल  ॥
  लागल  भूख  मधु र फल खयलो  हूँ
  लंका     जरलों    यौ   बजरंगी   ॥
               जगत  जनैया --- अहाँ  छी दुख--

   वर  अहिरावण  राम लखन  कउ
   बलि   प्रदान लउ   गेल  पताल  ।
   बंदि   प्रभू    अविलम्ब  छुरा कउ
   बजरंगी     कउ   देलौ  कमाल  ॥
   बज्र   गदा   भुज  बज्र जाहि  तन 
     कत   योद्धा  मरि   गेल   फिरंगी  , 
             जगत  जनैया ---अहाँ  छी दुख -

 वर शक्ति वाण  उर जखन लखन , 
 लगि  मूर्छित  धरा  परल निष्प्राण । 
 वैध     सुषेन   बूटी   जा   आनल  ,
 पल में  पलटि  बचयलहऊ प्राण  ॥ 
 संकट      मोचन   दयाक  सागर , 
 नाम      अनेक ,   रूप बहुरंगी  ॥ 
       जगत      जनैया --- अहाँ  छी दुख --

नाग  फास   में   बाँधी  दशानन  , 
राम     सहित   योद्धा   दालकउ । 
 गरुड़  राज कउ  आनी  पवन सुत  ,
कइल     चूर     रावण    बल  कउ 
जपय     प्रभाते    नाम अहाँ   के ,
तकरा  जीवन  में  नञि  तंगी   ॥ 
         जगत  जनैया --- अहाँ  छी दुख --

ज्ञानक सागर ,  गुण  के  आगर  ,
  शंकर    स्वयम  काल  के  काल  । 
जे जे अहाँ   सँ  बल  बति यौलक ,
ताही     पठैलहूँ   कालक   गाल   
अहाँक  नाम सँ  थर - थर  कॉपय ,
भूत - पिशाच   प्रेत    सरभंगी   ॥ 
     जगत   जनैया --- अहाँ  छी दुख -- 

लातक   भूत   बात  नञि  मानल ,
  पर तिरिया लउ  कउ  गेलै  परान । 
  कानै  लय  कुल  नञि  रहि  गेलै  , 
अहाँक   कृपा सँ , यौ  हनुमान  ॥ 
अहाँक   भोजन  आसन - वासन ,
राम  नाम  चित बजय  सरंगी  ॥ 
   जगत     जनैया --- अहाँ  छी दुख -

सील    अगार   अमर   अविकारी  ,
हे   जितेन्द्र   कपि   दया  निधान  । 
"रमण " ह्र्दय  विश्वास  आश वर ,
अहिंक एकहि  बल अछि हनुमान  ॥ 
एहि   संकट    में  आबि   एकादस ,
यौ   हमरो    रक्षा    करू   अड़ंगी  ॥ 
      जगत  जनैया --- अहाँ  छी दुख ----
|| 3 ||
हनुमान चौपाई - द्वादस नाम  
 ॥ छंद  ॥ 
जय  कपि काल  कष्ट  गरुड़हि   ब्याल- जाल 
केसरीक  नन्दन  दुःख भंजन  त्रिकाल के  । 
पवन  पूत  दूत    राम , सूत शम्भू  हनुमान  
बज्र देह दुष्ट   दलन ,खल  वन  कृषानु के  ॥ 
कृपा  सिन्धु   गुणागार , कपि एही करू  पार 
दीन हीन  हम  मलीन,सुधि लीय आविकय । 
"रमण "दास चरण आश ,एकहि चित बिश्वास 
अक्षय  के काल थाकि  गेलौ  दुःख गाबि कय ॥ 
चौपाई 
जाऊ जाहि बिधि जानकी लाउ ।  रघुवर   भक्त  कार्य   सलटाउ  ॥ 
यतनहि  धरु  रघुवंशक  लाज  । नञि एही सनक कोनो भल काज ॥ 
श्री   रघुनाथहि   जानकी  जान ।   मूर्छित  लखन  आई हनुमान  ॥ 
बज्र  देह   दानव  दुख   भंजन  ।  महा   काल   केसरिक    नंदन  ॥ 
जनम  सुकारथ  अंजनी  लाल ।  राम  दूत  कय   देलहुँ   कमाल  ॥ 
रंजित  गात  सिंदूर    सुहावन  ।  कुंचित केस कुन्डल मन भावन ॥ 
गगन  विहारी  मारुति  नंदन  । शत -शत कोटि हमर अभिनंदन ॥ 
बाली   दसानन दुहुँ  चलि गेल । जकर   अहाँ  विजयी  वैह   भेल  ॥ 
लीला अहाँ के अछि अपरम्पार ।  अंजनी  के   लाल   करु  उद्धार  ॥ 
जय लंका विध्वंश  काल मणि । छमु अपराध सकल दुर्गुन  गनि ॥ 
  यमुन  चपल  चित   चारु तरंगे । जय  हनुमंत  सुमति सुख गंगे ॥  
हे हनुमान सकल गुण  सागर  ।  उगलि  सूर्य जग कैल उजागर ॥ 
अंजनि  पुत्र  पताल  पुर  गेलौं  । राम   लखन  के  प्राण  बचेलों  ॥ 
पवन   पुत्र  अहाँ  जा  के लंका । अपन  नाम  के  पिटलों  डंका   ॥ 
यौ महाबली  बल कउ जानल ।  अक्षय कुमारक प्राण निकालल ॥ 
हे  रामेष्ट  काज वर कयलों ।   राम  लखन  सिय  उर  में लेलौ  ॥ 
फाल्गुन  सखा  ज्ञान गुण सार ।  रुद्र   एकादश   कउ  अवतार  ॥ 
हे पिंगाक्ष   सुमति  सुख मोदक ।  तंत्र - मन्त्र  विज्ञान के शोधक ॥ 
अमित विक्रम छवि सुरसा जानि । बिकट लंकिनी लेल पहचानि ॥ 
उदधि क्रमण गुण शील निधान ।अहाँ सनक नञि कियो वुद्धिमान॥ 
सीता  शोक   विनाशक  गेलहुँ । चिन्ह  मुद्रिका  दुहुँ   दिश  देलहुँ ॥ 
लक्षमण   प्राण  पलटि  देनहार ।  कपि  संजीवनी  लउलों  पहार ॥ 
दश  ग्रीव दपर्हा  ए कपिराज  । रामक  आतुरे   कउलों   काज  ॥ 
॥ दोहा ॥  
प्रात काल  उठि जे  जपथि ,सदय धरथि  चित ध्यान । 
शंकट   क्लेश  विघ्न  सकल  , दूर  करथि   हनुमान  ॥ 
|| 4 || 
|| हनुमान  द्वादस  दोहा || 

रावण   ह्रदय  ज्ञान    विवेकक , जखनहि  बुतलै  बाती  | 
नाश    निमंत्रण  स्वर्ण  महलके  , लेलक हाथ में पाती  || 

सीता हरण मरन रावण कउ , विधिना तखन  ई  लीखल | 
भेलै   भेंट  ज्ञान गुण  सागर , थोरवो बुधि  नञि सिखल || 

जकरे  धमक सं डोलल धरनी , ओकर कंठ अछि  सुखल  |
 ओहि पुरुषक कल्याण कतय ,जे पर  तिरिया के भूखल   ||   

शेष  छाउर   रहि  गेल   ह्रदय , रावण  के  सब  अरमान  | 
करम  जकर   बौरायले   रहलै  , करथिनं   कते  भगवन  ||

बाप सँ  पहिने पूत मरत  नञि , घन  निज ईच्छ  बरसात |
सीढी  स्वर्गे  हमहिं  लगायब  , पापी कियो  नञि तरसत ||

बिस भुज  तीन मनोरथ लउ  कउ , वो धरती  पर मरिगेल |
 जतबे  मरल  राम  कउ  हाथे ,  वो  ततबे  लउ  तरी  गेल ||  

कतबऊ  संकट  सिर  पर  परय , भूलिकय करी नञि पाप  |
लाख पुत  सवालाख  नाती  , रहलइ   नञि    बेटा   बाप  || 

संकट  मोचन भउ  संकट में , दुःख सीता जखन बखानल  | 
अछि  वैदेही धिक्कार  हमर , भरि  नयन  नोर  सँ  कानल  || 

स्तन  दूधक   धारे   अंजनि   ,  कयलनि   पर्वत  के  चूर  | 
ओकरे  पूत  दूत  हम  बैसल , छी  अहाँ    अतेक  मजबूर   || 

रावण  सहित  उड़ा  कउ  लंका , रामे  चरण धरि  आयब  | 
हे , माय   ई   आज्ञा  प्रभु  कउ ,   जौ   थोरबहूँ  हम पायब ||

हे माय  करू विश्वास अतेक  , ई  बिपति रहल दिन थोर   | 
दश  मुख दुखक  एतैय  अन्हरिया , अहाँक  सुमंगल भोर  || 

" रमण " कतहुँ नञि  अतेक व्यथित , हे कपि भेलहुँ उदाश | 
सर्व  गुणक  संपन्न   अहाँ  छी , यौ  पूरब   हमरो   आश  || 
||5 ||

|| हनुमंत - पचीसी || 
  हनुमान   वंदना  
शील  नेह  निधि , विद्या   वारिध
             काल  कुचक्र  कहाँ  छी  
मार्तण्ड   तम रिपु  सूचि  सागर
           शत दल  स्वक्ष  अहाँ छी 
कुण्डल  कणक , सुशोभित काने
         वर कच  कुंचित अनमोल  
अरुण तिलक  भाल  मुख रंजित
            पाँड़डिए   अधर   कपोल 
अतुलित बलअगणित  गुण  गरिमा
         नीति   विज्ञानक    सागर  
कनक   गदा   भुज   बज्र  विराजय 
           आभा   कोटि  प्रभाकर  
लाल लंगोटा , ललित अछि कटी
          उन्नत   उर    अविकारी  
  वर   बिस   भुज  रावणअहिरावण
         सब    पर भयलहुँ  भारी  
दीन    मलीने    पतित  पुकारल
        अपन  जानि  दुख  हेरल  
"रमण " कथा ब्यथा  के बुझित हूँ
       यौ  कपि  किया अवडेरल
-:-
|| दोहा || 
संकट  शोक  निकंदनहि , दुष्ट दलन हनुमान | 
अविलम्बही दुख  दूर करू ,बीच भॅवर में प्राण ||  
|| चौपाइ || 
जन्में   रावणक   चालि    उदंड | 
यतन  कुटिल   मति चल  प्रचंड  || 
बसल जकर चित नित पर नारि   | 
जत शिव पुजल,गेल  जग  हारि  || 
रंग - विरंग   चारु     परकोट   | 
गरिमा   राजमहल   केर   छोट || 
बचन  कठोरे    कहल   भवानी | 
लीखल भाल वृथा  नञि  वाणी  || 
रेखा       लखन     जखन    सिय  पार  |
वर        विपदा      केर    टूटल   पहार ||
तीरे     तरकस     वर   धनुषही  हाथ   | 
रने -       वने      व्याकुल     रघुनाथ  || 
मन मदान्ध   मति गति सूचि राख  | 
नत   सीतेहिअनुचित जूनि   भाष  || 
झामरे -  झुर   नयन  जल - धार  | 
रचल    केहन   विधि  सीय   लिलार || 
मम   जीवनहि    हे   नाथ    अजूर   | 
नञि  विधि   लिखल   मनोरथ  पुर  || 
पवन    पूत   कपि     नाथे    गोहारि  | 
तोरी      बंदि    लंका   पगु      धरि  || 
रचलक    जेहने    ओहन     कपार  | 
 दसमुख    जीवन     भेल      बेकार  || 
रचि     चतुरानन     सभे     अनुकूल  |
भंग  - अंग  , भेल  डुमरिक   फूल  || 
गालक    जोरगर    करमक    छोट  | 
विपत्ति   काल  संग  नञि  एकगोट || 
हाथ  -   हाथ    लंका    जरी     गेल  | 
रहि    गेल   वैह  , धरम - पथ  गेल || 
अंजनि    पूत     केशरिक       नंदन  | 
शंकर   सुवन    जगत  दुख   भंजन  || 
अतिमहा     अतिलघु     बहु     रूप  | 
जय    बजरंगी     विकटे    स्वरूप   || 
कोटि     सूर्य    सम    ओज    प्रकश | 
रोम -  रोम      ग्रह   मंगल     वास  || 
तारावलि     जते    तत     बुधि  ज्ञान |
पूँछे  -  भुजंग     ललित     हनुमान || 
महाकाय        बलमहा       महासुख  | 
महाबाहु       नदमहा       कालमुख  || 
एकानन     कपी    गगन      विहारी  | 
यौ     पंचानन       मंगल      कारी  || 
सप्तानान     कपी   बहु  दुख   मोचन | 
दिव्य   दरश   वर   ब्याकुल   लोचन  || 
रूप    एकादस      बिकटे     विशाल  | 
अहाँ    जतय     के     ठोकत    ताल || 
अगिन   बरुण   यम  इन्द्राहि  जतेक | 
अजर - अमर    वर   देलनि  अनेक ||  
सकल    जानि     हषि    सीय    भेल | 
सुदिन    आयल   दुर्दिन    दिन   गेल || 
सपत   गदा   केर   अछि   कपि   राज | 
एहि    निर्वल    केर   करियौ    काज  || 
|| दोहा  ||
जे   जपथि  हनुमंत  पचीसी  
सदय    जोरि  जुग    पाणी  | 
शोक    ताप    संताप   दुख    
 दूर   करथि   निज   जानि || 


|| 6 ||
  ||  हनुमान  बन्दना  ||

जय -जय  बजरंगी , सुमतिक   संगी  -
                       सदा  अमंगल  हारी  । 
मुनि जन  हितकारी, सुत  त्रिपुरारी  -
                         एकानन  गिरधारी  ॥ 
नाथहि   पथ गामी  , त्रिभुवन स्वामी  
                      सुधि  लियौ सचराचर   । 
तिहुँ लोक उजागर , सब गुण  आगर -
                     बहु विद्या बल सागर  ॥ 
मारुती    नंदन ,  सब दुख    भंजन -
                        बिपति काल पधारु  । 
वर  गदा  सम्हारू ,  संकट    टारू -
                  कपि   किछु  नञि   बिचारू   ॥ 
कालहि गति भीषण , संत विभीषण -
                          बेकल जीवन तारल  । 
वर खल  दल मारल ,  वीर पछारल -
                       "रमण" क किय बिगारल  ॥ 

   
|| 8  ||
  बजरंग -विनय 
बहक  काज सुगम सँ  कयलों 
हमर   अगम    कीय  भेलै  यौ  | 
रहलौं   अहिंक  शरण में हनुमंत 
जीवन   कीय  भसिअयलै    यौ  || 
          सबहक   ----हमर ---   २ 
क़डीरिक  वीर सनक  जीवन ई 
मंद   बसात    नञि झेलल  यौ  | 
हम दीन , अहाँ   दीनबन्धु  छी 
तखन  कीयक  अवडेरल  यौ   || 
         सबहक   ----हमर ---   २ 
अंजनी लाल , यौ  केशरी  नंदन 
जग  में कियो  अपन  नञि यौ  | 
एक  आश ,  विश्वास   अहाँक  
वयस   हमर   झरि  गेलै  यौ  || 
        सबहक   ----हमर ---   २ 
मारुति  नंदन , काल  निकंदन 
शंकर  स्वयम   अहाँ   छी  यौ  | 
"रमण "क  जीवन करू सुकारथ 
दया  निधान  कहाँ   छी   यौ 
सबहक   ----हमर ---   २ 
    || 9 . || 
                                       ||  हनुमान - आरती  ||
आरती आइ अहाँक  उतारू , यो अंजनि सूत केसरी नंदन  । 
अहाँक  ह्र्दय  में सतत   विराजथि ,  लखन सिया  रघुनंदन   
             कतबो  करब बखान अहाँ के '
            नञि सम्भव  गुनगान  अहाँके  । 
धर्मक ध्वजा  सतत  फहरेलौ , पापक केलों  निकंदन   ॥ 
आरती आइ ---  , यो  अंजनि ---- अहाँक --- लखन ---
          गुणग्राम  कपि , हे बल कारी  '
          दुष्ट दलन  शुभ मंगल कारी   । 
लंका में जा आगि लागैलोहूँ , मरि  गेल बीर दसानन  ॥ 
आरती आइ ---  , यो  अंजनि ---- अहाँक --- लखन ---
         सिया  जी के  नैहर  , राम जी के सासुर  '
         पावन     परम   ललाम   जनक पुर   । 
उगना - शम्भू  गुलाम जतय  के , शत -शत  अछि  अभिनंदन  ॥ 
आरती आइ ---  , यो  अंजनि ---- अहाँक --- लखन ---
           नित     आँचर   सँ   बाट      बुहारी  '
          कखन   आयब   कपि , सगुण  उचारी  । 
"रमण " अहाँ के  चरण कमल सँ , धन्य  मिथिला के आँगन ॥ 
 आरती आइ ---  , यो  अंजनि ---- अहाँक --- लखन ---
||10  ||

रचैता -

रेवती   रमण झा " रमण "
ग्राम - पोस्ट - जोगियारा पतोर
आनन्दपुर , दरभंगा  ,मिथिला
मो 09997313751