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बुधवार, 21 मार्च 2018

चैतावर

|| चैतावर || 

चैतक        चमकल       इजोरिया 
बलमू   मोरा    मन   तरसाबै    रे | 
रहि -   रहि     कुहकै    कोयलिया  
बलमु     मोरा     मन  तरसाबै  रे || 
            चैतक  --- बलमु --
फुलवन में भँवरा ,करै रंगरेलिया  |
लायल      वसन्तो      बहुरिया   ||
बलमू       मोरा    मन  तरसाबै   रे
                  चैतक  --- बलमु --

पियु -पियु पपिहा ,करै अधिरतिया |
लिखल       सनेहक         पतिया  | |
बलमू      मोरा      मन   तरसाबै   रे
                       चैतक  --- बलमु --
नेमुआँ  फुलायल , अमुआँ  मजरल |
फ़ुलल         जूही          चमेलिया   ||
बलमू       मोरा       मन   तरसाबै   रे
                        चैतक  --- बलमु --
"रमण " पथिक ,पथ प्राण पियासल |
गोड़ियाक    छलकल     गगाड़िया  ||
बलमू       मोरा      मन  तरसाबै   रे
  चैतक  --- बलमु --
लेखक -
रेवती रमण  झा "रमण "



मंगलवार, 20 मार्च 2018

अभिलाषा

                             || अभिलाषा ||

                      इच्छा   नै   सुरपुर   धाम   चली
                      एहि मृत्यु भुवन नै पूज्य कहाबी ।
                      प्रतिजन्म  एक हि अभिलाष हमर
                      निज मातृ भूमि मिथिलेक देखाबि ।।

                      गुणगाण  बखानहुँ  कोटि  करी
                      जे  करी, नै मैथिली  योग्य करी ।
                      लखि धाम ललाम गुलामहुँ धरि
                      स्वीकार  शम्भु   तिरहुत  नगरी ।।

                      किछु आर  प्रयास करी नै करी
                      जँ करी,तय करी अतबेक देखाबि ।
                      मिथिला मुख  सं मैथिली मधुर
                      ई कुशल अतेक सदिकाल सुनाबी ।।

                      हम  देखी जतय , आ जतय सुनी
                      अपनहि निज भेष,अपन भाषा ।
                      जागू मैथिली जन-जन मिथिला
                     "रमण" क अपने सं अछि आशा ।।

                                       रचयिता
                            रेवती रमण झा " रमण "
                                         
                               

सोमवार, 12 मार्च 2018

"गौरवशाली इतिहास आओर पिछड़ल वर्तमान"

"गौरवशाली इतिहास आओर पिछड़ल वर्तमान"
        गौरवशाली इतिहास आओर पिछड़ल वर्तमान एहि दू शब्दसँ, मिथिलाक परिचय देल जा सकैत अछि । इतिहाससँ वर्तमानक दूरि तय करबाक क्रममे जाहि दू परस्पर विरोधी शब्दक प्रयोग करबाक लेल बाध्य भेलौं अछि, एहिके वेदना बुझल जेबाक चाही, नञि कि पटकथाके रोमांच करबाक प्रयास ।

     प्राचीन कालहिंसँ मिथिला अपन विशिष्टताके संग अलग जगह बनौने अछि । आन सभ्यता-संस्कृतियों एकर स्वीकारोक्ति करैत छथि, किन्तु योग्यतानुरूप मिथिलाके यथोचित प्रशस्ति देबामे कंजुसी सेहो करैत छथि ।
          मिथिलाक उल्लेख रामायण कथामे सेहो अबैत अछि । भगवान श्रीरामके सासुर व माता जानकीक नैहरके रूपमे मिथिलाक परिचय देल गेल अछि, जे कि तथ्यक एक पहलु मात्र अछि । वस्तुतः ई मिथिलाक पावन भूमिके श्रेष्ठताक प्रमाण अछि कि स्वयं जगतजननी जानकी एहि पवित्र माइटसँ जन्म लेलनि । माँ मैथिलीक महानता व मिथिलाक बेटीक पवित्रता तS देखल जाऊ कि जाहि शिव धनुषके पैघ सँ पैघ बलशाली राजा हिला-डोला नञि सकलाह, ओहि शिव धनुषकें सीता बामा हाथसँ उठाके नित्य अड़िपन लगाबैत छलीह ।
          भगवान श्रीरामकें मर्यादा पुरूषोत्तम कहल गेल छनि । परन्तु विचारणीय अछि कि - 'मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम' बनेबामे भगवती सीता मैय्याके कतेक योगदान छलन्हि ? हमरा बुझने ई मिथिलापुत्री जानकी केर पवित्रता, सहनशीलता, धर्मपरायणता एवं पतिव्रता छलन्हि जे हिनक पतिक प्रत्येक निर्णयके, बिना किछु स्वयंके विषयमे सोचने कार्यान्वित कयलनि ।
           मिथिलाक बेटीक त्याग व एक पत्नीके रूपमे देल गेल स्वयं केर बलिदानके इतिहास गौण कS देलक आओर श्री राम, मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम भS गेलथि । ई मिथिलाक माटिक उर्वरता अछि जे अपन बेटीमे पवित्रता, धर्मपरायणता व आदर्शकें बीजारोपण करैत आबि रहल अछि । दुनिया आइ नारीवादके संकल्पना कS रहल अछि मुदा हमरा लोकनिक सदातनीसँ "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता" केर सम्पोषक रहलौं अछि । कोनो प्रकारक उत्सव-महोत्सवक सुअवसर पर आयोजनक शुभारम्भ गोसाऊनिक गीत "जय-जय भैरवि असुर भयाउनि" सँ करैत छी । भारती, मंडन मिश्रजीक पत्नी जे शंकराचार्यके शास्त्रार्थमे हरौलनि, एक उदाहरण छथि मिथिलाक नारी शक्ति आओर सम्मानके ।
             वर्तमान समयमे इंटरनेटके सुलभ संसारमे विवाह संबंधी "मेट्रोमोनियल साइट्स" केर अवधारणा आयल । जाहिसँ समाज लाभान्वित होइत आबि रहल अछि । परन्तु मिथिलाक लेल गौरवक विषय थिक जे मिथिलामे एहि प्रकारक व्यवस्था सैकड़ों वर्षसँ चलि आबि रहल अछि । उदाहरण स्वरूप मैथिल ब्राह्मणक विवाहक ऐतिहासिक विवाह-स्थली सौराठक चर्चा करब । सौराठमे प्रत्येक वर्ष सुधक समय विवाह योग्य पुरूषके सभा आयोजित कयल जाइत अछि । आई आनुवंशकीय प्रोद्यौगिकीमे समजातीय, वंश-परम्पराक कुलक जिन्ससँ उत्कृष्ट संततिके प्राप्त कयल जाइत अछि जकरा मिथिलाक पंजी व्यवस्थामे पंजीकार एहि तकनीककें कार्यान्वित करैत छथि एवं सिद्धान्त लिखबासँ पूर्व वर एवं कन्या पक्षक सात-सात पीढ़ीक मूल-गोत्रक अन्वेषण करैत छथि ।
          मध्यकालीन भारतमे जखन लगभग सम्पूर्ण भारत मुस्लिम प्रभावसँ प्रभावित छल एवं संस्कृत साहित्य संकटमे छल, ताहि समय मिथिलाक भूमिका ब्राह्मण संस्कृत साहित्य आओर संस्कारकें संरक्षित करैत संरक्षण व संवहन कयलक जे कि आधुनिक काल धरि चलि आबि रहल अछि । स्वo गंगानाथ झाजीके साहित्यिक योगदानक लेल ब्रिटिश सरकार हिनका "सर" उपाधिसँ विभूषित कयलक ।
          आजादीक बादक दशकमे मिथिला अपन गौरवशाली विरासतकें आगाँ बढ़ेवामे पिछड़ैत गेल । विद्वता, ज्ञान-विज्ञान, कला-साहित्य व संस्कृतिक लेल शिखरस्थ पर आरूढ़ मिथिला, वर्तमान समयमे गरीबी, अशिक्षा, दहेज प्रथा आदि अनेकों प्रकारक सामाजिक दोषसँ ग्रसित अछि । हमरा लोकनिक आयोजन-उत्सवक विशेष अवसर पर किंवा ओन्हायतहुँ गाबि लैत छी "स्वर्गसँ सुन्दर मिथिलाधाम......" किन्तु एहि स्वर्गमे एतेक दोष कतS सँ आबि गेल तथा एहि दोष सभसँ कोन प्रकारें मुक्त भेल जेबाक चाही से बेशी महत्वपूर्ण अछि ।
           एक बहुसंख्यक आबादी पृथक मिथिला राज्यक निर्माणकें सभ समस्याक समाधान मानैत छथि आओर कऐक वर्षसँ एहि दिशामे प्रयासरत् सेहो छथि । प्रबुद्ध पाठकगणकें जानकारी हेतैन जे भाषायी आधार पर राज्यक निर्माण हेतु १९५६ ई. मे "राज्य पुनर्गठन आयोग" केर स्थापना भेल । मैथिली भाषाके आधार पर मिथिला राज्य निर्माण हेतु ज्ञापण देल गेल, परन्तु अत्यधिक वेदनाक संग लिखS पड़ि रहल अछि जे "राज्य पुनर्गठन आयोग" मिथिला राज्य हेतु अनुशंसा तS दूर, एहि पर विचार तक नञि कयलक ।
         मैथिली आन्दोलन शक्तिविहीन अछि एहि यथार्थकें स्वीकार करहिं पड़त । बहुवर्गीय विशाल जनसमुदाय रहलाक बावजुदो मैथिली आन्दोलन तथाकथित स्वयंभू ब्राह्मण व कर्ण कायस्थसँ पृथक वर्गके अपनामे नञि जोड़ि पाबि सकला अछि । हलाँकि मिथिलाक विद्या-विभूतिसँ सजल विद्वतजन् द्वारा कयल गेल साहित्यिक कार्यक बलें, मैथिलीके एक भाषाक रूपमे सम्मान भेटल अछि । १९६५ ई.मे साहित्य अकादमीमे सम्मिलित भेनाई एवं २००३ ई.मे संविधानक अष्टम् अनुसूचिमे सम्मिलित भेनाई पैघ उपलब्धि अछि किन्तु एहिसँ आगाँ मिथिला-मैथिलीक लेल किछु नञि भS सकल अछि । एहिसँ बेशीक कल्पना, कल्पने धरि सीमित रहत, जावत् धरि सभ वर्गक सामुहिक सहभागिता नियोजित नञि होयत ।
           जहिना मिथिलाके ब्राह्मण केवल मैथिल ब्राह्मणक रूपमे परिचित होइत छथि, तहिना आनो वर्ग यथा यादव 'मैथिल यादव', कोयरी 'मैथिल कोयरी', दुसाध 'मैथिल दुसाध', चमार 'मैथिल चमार' वा मुस्लिम 'मैथिल मुस्लिम' आदि केर रूपमे अनिवार्यतः जानल जेबाक चाही संगहि एहि परिचयसँ गर्वक अनुभव करथि, तखनहिं मिथिला व मैथिलीक व्यापक लक्ष्य प्राप्त करायल जा सकैत अछि ।
         एकटा आओर समस्या अछि । जेनां कि मैथिलजन बहुतायत रूपसँ प्रायः महत्वाकांक्षी होइत छथि संगहि अहंकारी सेहो । आपसी संबंधमे मेल-मिलाप नञि रहबाक कारणें, बहुधा देखल जा रहल अछि जे देश भरिमे हजारों मैथिल संगठन भेलाक बावजुदहुँ, सामुहिक प्रयासक बलें मिथिलाक सर्वांगीण विकासक अवधारणा स्वप्नवते अछि । आवश्यकता आकांक्षित अछि किछु निःस्वार्थ व वियोगी व्यक्तिक नेतृत्वक ।
           महत्वपूर्ण तथ्यके अपने लोकनिक समक्ष प्रस्तुत करैत निवेदन करब जे मिथिला, एक प्रदेश, एक संस्कृति, एक विरासत केर रूपमे भलेहि पिछड़ि रहल अछि मुदा मैथिलजन लाखोंक संख्यामे अपन व्यक्तिगत क्षमतामे बहुत विद्वान, गुणवान, धनवान एवं सभ प्रकारक सामर्थ्यसँ सामर्थ्यवान छथि । जँ सभ कियो आपसी मतान्तरकें बिसरि एकत्रित भS जाइथ, रंचमात्रहुँ संदेह नञि जे मिथिलाक भाग्योदय निश्चित रूपें होयत ।
            मिथिला व मैथिलीक विषय एतेक व्यापक अछि जे लिखनाई कठिन अछि । समय व स्थान कम्म पड़ि जायत । सारांशतः इएह कहब जे जतय साँझ पड़ितहिं घर-आँगनमे दीया-बाती होइत भगवतीक गीत "जगदम्बा घरमे दीयरा बारि एलौं हे ....." सँ नभ गुंजयमान भS जाइत छल, आई एक शांत अन्हारक अन्हरगुप्पीसँ ग्रसित अछि । दिया-बाती तS एखनहुँ होइत अछि मुदा टेमीक लौ मद्धिम भS गेल अछि जकर स्वरूप अन्हार, कारी, घनघोर स्याह रूपमे परिवर्तित भयावह रूप लक्षित भS रहल अछि । राति बढ़ल जा रहल अछि बस एक उम्मीद अछि राति जतेक बढ़ैत अछि, भोर ततबे लSग भेल जा रहल अछि । इत्यलम् । जय श्री हरि ।



श्री राज कुमार झा जीक कलम सँ
सौजन्यसं 
संजीब झा.
मधुबनी मिथिला.
१२-०३-२०१८.

गुरुवार, 21 दिसंबर 2017

महाकाव्य ओ महाकाव्याभास - वहुभाषाविद, भाषा वैज्ञानिक डॉ० सुभद्र झा









मिथिला भाषा शब्दकोष - वहुभाषाविद, भाषा वैज्ञानिक डॉ० सुभद्र झा








अन्हेर मचल अछि

जत्तहि देखब नजरि उठा केँ सभठामे अन्हेर मचल अछि |
छथि सांसद जनता केर प्रतिनिधि ,अछि करोड़ मे भत्ता वेतन|
शान ओ शौकत अछि राजा केर , देश विदेश मे अरव खरव धन |
क़ानून बना के तोड़थि अपनेँ, अस्त्र हिनक एहि दल ओहि दल अछि |
सभ ठामे अन्हेर मचल अछि ||
दलक निकलुआ राज्य सभा केर ,मंत्री पद पदवी लय भूखल ,
देशक हित अनहित नहि मतलब ,सत्ता भत्ता केर फल चाखल ,
जनता सँ नहि कोनो मतलब ,धत्ता देब विपक्षक कल अछि |
सभ ठामे अन्हेर मचल अछि ||
राज्यक ई विधान मंडल अछि ,अपना अपनी मे दंगल अछि
सभ के जाति समाजक बल अछि , कुर्शी केर चिंता पल पल अछि ,
पाँच साल लय ई बलबंता , ‘मधुकर’ भूखल जन बेकल अछि |
सभ ठामे अन्हेर मचल अछि ||
***********राम चन्द्र मिश्र "मधुकर" *****

18/11/2016

मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

जे छल सपना

||  जे छल सपना  || 

सुन - सुन  उगना  , 
कंठ सुखल मोर  जलक बिना  | 
सुन - सुन  उगना  ||  
                    कंठ  सुखल -----
नञि  अच्छी घर कतौ  !
नञि अंगना 
नञि  अछि  पोखैर कतौ 
नञि  झरना  | 
सुन - सुन  उगना  ||
                   कंठ  सुखल -----
अतबे  सुनैत  जे 
चलल   उगना  
झट दय  जटा  सँ 
लेलक  झरना  | 
सुन - सुन  उगना  ||
                   कंठ  सुखल -----
निर्मल  सुरसरि  के  
केलनि  वर्णा  |
 कह - कह  कतय सँ 
लय   लें  उगना  || 
सुन - सुन  उगना  ||
             कंठ  सुखल -- 
अतबे  सुनैत  फँसी  गेल  उगना 
"रमण " दिगम्बर  जे 
त्रिभुवनमा  -
सुन - सुन  उगना  ||
                   कंठ  सुखल -----


सोमवार, 18 दिसंबर 2017

विद्यापति स्मृति पर्वक अवसर पर --उगना सँ

शिव उगना बनि एक बेर पुनि मिथिलानगरी आउ |
ई थिक विसपी गाम , सुनब नहि सम्भव एतय नचारी |
सुना परत घर घर आँगन सँ , उकटम पैंचा गारा गारी |
पीपर तर चौपारि कविक छल ,ओतय बिकाइछ तारी |
पीबि केँ सनकल अपनहिँ मे, सभ करैये मारा –मारी|
भाँगक बदला अहूँ पीबि केँ, भरि लबनी भसिआउ |
शिव उगना बनि एक बेर पुनि, मिथिलानगरी आउ ||
आब ने जारनि फारय परत अहाँ केँ एहि ठाँ शंकर|
गैस सिलिंडर सँ चुल्हा जरैत अछि सबहक घर- घर |
हाथ नेने खोरनाठी आब ने कवि पत्नी केँ देखब |
आब ने कवि केर गाए बरद केँ चरा बाध सँ आनब |
घासक बदला चारा दाना कीनि केँ हाट सँ लाउ |
शिव उगना बनि एक बेर पुनि मिथिला नगरी आउ ||
शिव सिंहक दरवार आब ने मोटरी लय केँ जाएब |
प्यासल कवि केँ गंगाजल शिव जटा सँ आनि पिआएब |
चीन्हत आब ने कियो अहाँ केँ हे गंगाधर !
खाहेँ गंगाधार भूमि पर जटा सँ अहाँ बहाउ |
शिव उगना एक बेर पुनि मिथिला नगरी आउ ||
भव्य भवानीपुर मे बनल अहँक स्मारक ,
मेला ठेला हाट बजार लगै अछि अनुपम |
लोटा लोटा जल चढाबय अहँक लिंग पर ,
नारा लगा के जोर जोर सँ हर हर बम बम |
आब ने ओतय अभाव जलक अछि ,पोखरि कूप नहाउ |
शिव उगना बनि एक बेर पुनि मिथिला नगरी आउ ||
अहाँ अदृश्य भेलौं तँ कवि पागल बनि केँ बौएला
आब ने ताकत कियो रने वन ,उगना रे मोर कतय गेला ?
शिव वाणेश्वर लिंग रूप मे आब देब ककरा दर्शन ,
भक्त अहाँ के आब ने मिथिला कविवर विद्यापति सन |
स्वर्ग सँ पुनि कवि विद्यापति केँ मिथिला नगरी लाउ |
शिव उगना बनि एक बेर पुनि मिथिला नगरी आउ ||
******राम चन्द्र मिश्र "मधुकर",  *****
13/11/2016

शनिवार, 16 दिसंबर 2017

उर्मिला

हँ हम उर्मिला छी
अस्तित्व विहीन संघर्ष रत
अपना आप के ढुढ़ैत तकैत
परित्यक्ते त रहलहुँ हमहुँ
पूरा पूरी चौदह साल
दीप लेसि हम अंतर बाहर
ताकी पहु निज दुनू ठाम
बाहर दीपजरैअछि टिम - टिम

अंतर मन में हाहाकार
कर्मक नहि भेटल अधिकार
पथ बाधा त नहिञें बनितहुँ
एकमात्र आशा छल प्रिय सँ

भरलनि अंतर मन बस ज्वार
लए चलितथि हमरो निज संग
रचलन्हि बिधना केहन विधाता
केलनि विधाता की हमरा संग
सिये-सिये जपितथि नहि सभजन

पुरितइ हमरो सभ मनकाम
जइतहुँ वन जौं हमहुँ पहु संग
देखितथि हमरो हृदयक संताप

दुनू बहिनी रहितहुँ संग मिली
मेटितहुँ भरिसक विधिक - विधान
तरसै अछि दर्शन विनु नैन
 

कल्पना झा

शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

कहू गर्व सँ हम मैथिल छी

छी  मैथिल जते कहाबी , नहि मिथिला नाम घिनाबी | 
सभ फुसिये  गाल बजाबी ,अछि  खूब कविलती दावी |
  अपनों हक उचित ने पाबी ,नहि मिथिला नाम घिनाबी ||
सभ स्वार्थे  मे घुरियाबी ,कहि जाति  अजाति  लड़ाबी ,

दिन बैसल  ब्यर्थ  बिताबी ,गौरव  टा   ब्यर्थ    देखाबी | 
गढ़ि- गढ़ि के बात बनाबी ,नहि मिथिला नाम घिनाबी ||
   कहु गर्व सँ हम छी मैथिल ,कए सकल राज्य नहि हासिल ,
 नहि रहल परस्पर हिलमिल ,अपना मे कएल  फुटौअलि | 
झुट्ठे के  गाल   बजाबी ,  नहि  मिथिला नाम  घिनाबी ||
सभ जाति छी  मिथिलाबासी ,मैथिल  सन्तान   प्रवासी ,
त्यागू  आलस्य   उदासी ,  सभ  द्वेष  जे    सत्यानासी |
मिलि जुलि के जोर लगाबी ,नहि मिथिला नाम घिनाबी ||
नहि  पाश्चाताप  केने  फल ,नहि   कोनो अर्थ मे निर्वल ,
लेब  राज्य  एकता  केर बल ,हो प्राप्त  रहय जे  जागल  | 
क्षमता सभ अपन देखाबी , नहि मिथिला नाम घिनाबी ||
हम  शक्ति उपासक मैथिल, हम   करब अवश्ये  हासिल ,
  हम क्रान्तिकरब  सभ हिलमिल ,सभ जातिक बंधन कए | 
तन  मन धन नाहि नुकाबी ,नहि मिथिला नाम घिनाबी ||
होउ क्रान्ति करक हित तत्पर ,अंदोलन  एहि लय सत्वर ,
नहि करू भरोसा अनकर , निर्माण राज्य जन हितकर  | 
ता मोजर देत ने ‘मधुकर’ , मिथिला नहि राज्य बनाबी ||

**राम चन्द्र मिश्र "मधुकर", ***

गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

मजूर

मजूरक नाम पर योजना बनै छै,
नहि भेलै ओकर दशा सुधार।
एखनो जे मजूरी करै छै,
खाइ छै ल'  क' पैंचि-उधार।
भरि दिन मेहनति- मजूरी केलक,
खटैत-खटैत छै हाड़ जागल।
अखरा नून रोटी खाक',
भरि दिन मालिकक काज मे लागल।
साँझ मे मालिकक मुँहतक्की,
कमाओल बोनि लेल उखराहा भरि ठाढ़।
एखनो जे मजूरी करैत छै,
खाइ छै ल'  क'   पैंचि-उधार।
रोइयाँ- रोइयाँ कर्ज मे डूबल,
टूटल- फाटल घर दलान।
की खेतै, की कर्ज सधेतै,
सोचिते- सोचिते छूटै प्राण।
शोषण- कुपोषण  मरैत काल तक,
जनमिते मेहनत- मजूरी लिखल कपार।
एखनो जे मजूरी करैत छै,
खाइ छै ल' क' पैंचि-उधार।
सभ कहैए  हम मजूर हितैषी,
ओकरे नाम पर बनबै सरकार।
ओकर उचित हिस्सा की देतै,
खा लैए सभ आगाँक आहार।
ओकर मेहनत सँ सभ धनवान,
ओ ओहिना रहि गेल भूखल लाचार।
अखनो जे मजूरी करैत छै,
खाइ छै ल' क' पैंचि-उधार।
मजूरक नाम पर योजना बनैत छै,
नहि भेलै ओकर दशा सुधार।
 
कमलेश प्रेमेंद्र
आहपुर-दामोदरपुर,बेनीपट्टी

बुधवार, 13 दिसंबर 2017

श्रधेय राजकमल के प्रति काव्यांजलि


धरती सँ
मुक्त आकाश धरि
अहाँक साहित्यिक उच्चता
समुद्र सन 
तकर गंभीरता
जीवन सन सत्यता
मृत्यु सन यथार्थता
अहाँक साहित्यिक
इएह मूलभूत
उत्स थीक
अहाँक शब्द में
विशाल भावक
परिकल्पना
इएह तें
दर्शन थीक।
छान्हि नै
बान्हि नै
प्रवहमान भाव अछि
छाँटल नै
काढल नै
परम्पराक साँच पर
गढल नै
थाहि थाहि
चढल नै।
जिनक सहजहिं
स्वभाव अछि
दल दल मे
जे नै धँसल
सएह भेलखिन
राजकमल।

 

स्वाती शाकम्भरी
(Swati Shakambhari)
सहरसा।

गजल- गुम्मो रहि क' देखियौ

जिनगी  वरू संघर्षे   भरल हो, एको क्षण  जीवि क' ' देखियौ I
अन्हारक जे सिद्दति  छै, से ईजोत के मुट्ठी मे बान्हि कदेखियौ I

  जानि ने के कहि देलक आहाँके जे रक्तक सम्बन्ध पकिया होई छै I
  सहोदरो अंठिया बनिजाई छै,कोनो गलती 'कहियो कके 'देखियौI

एक   तरफा स्नेहक  दीप   कहु,  आहाँ कतेक काल जड़ा क' रखबै I
कहियो भरल बरिसात  मे कतहु, भीतक घर बना क' ' देखियौ I

 नीक-अधलाह किछु कतहु जे बाजब, से काने-कान पसरबे करतै I
बदनामी सँ कहिया  धरि बाँचब, गुम्मो वरू  रहि क' देखियौ I

पुरल  छै  सभटा आस  ककर, दुनिया मे कहाँ कतहु   कहियो I
फाटल आञ्चर   सँ  आसक  गेंठी कहियो  फोलि क' ' देखियौ I

लोकक पैर  सँ  बाटक   पाथर,  सभ दिन  एहिना उडैत  रहतै I
किन्साईत   कोनो   हीरा  ने हो,  कखनो  उठा क' '  देखियौ I

कपड़जरू  फूल त' कांट  पर  पोसा क' माटिये मे  मेटैत  रहतै I
सौभाग्य हेतई ओकरो, कहियो आहाँ आँचर मे उठा क' देखियौ I

उठि क' जे  ठाढ़ो ने भ' सकल, कियै   मोन केयो  रखतै ओकरा I
खड़ी हम नित उचारैते छी, हमरो आँगन  आबि क' ' देखियौ I

***
कुमार मनोज कश्यप
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मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

सर्वतंत्रस्वतंत्र पण्डित बच्चा (धर्मदत्त) झा (1860-1921)

           
      [1]  मिथिलामे न्यायकें धारा ईसा पश्चात् नवम शताव्दीमे जे प्रवाहित भेल कोनो ने कोनो रूपमे एखनो धरि बहैत आबि रहल अछि। मिथिलामे एहि शताव्दीक प्रतिनिधि छलाह सर्वतन्त्रस्वतंत्र पण्डित धर्मदत्त झा जे बच्चा झाक सँ विख्यात भेलाह। 
बच्चा झा मिथिलाक कोरा मे स्थित दरभंगा जिलाकलवाणी’ (नवानी)  नामक गाँव मे 1917 वैक्रम मे(1860 ई०)  चैत्र शुक्ल नवमी ' उत्पन्न भेल छलाह।  हिनक पितामहक नाम पण्डित रत्नपाणि झा छलन्हि। पण्डित रत्नपाणि दरभंगाधीश्वर श्रीमान रुद्रसिंह महाराज के राजपण्डित छलाह। हिनक आचरण शुद्ध स्मार्त साहित्यकेँ पाण्डित्यक कारणेँ  दरभंगा मे ' महर्षि' कोटि मे परिणित होइत छलन्हि। किछु स्मार्त निबंध सबहुक रचना सेहओ कएने छलाह।  पण्डित रत्नपाणिकेँ एकहिंटा पुत्ररत्न भेलन्हि - पण्डित दुर्गादत्त झा, जे हमर चरित्र नायकक पिता छलाह। हिनक नाम ' धर्मदत्त राखल गेलन्हि मुदा माय - बाबू दुलारसँ  हिनका बाल्यहिंकालसँ जे ' बच्चा' आख्या देलन्हि से बादमे सर्वत्र प्रचलित ' गेल।
         पण्डित बच्चा झाक प्रारम्भिक अध्ययन अपने घरसँ भेलन्हि। कालान्तरमे ' ठाढ़ी' गामक निवासी विद्वमुर्धन्य  पण्डित विश्वनाथ झा सँ पढ़बा लेल गेलाह। पण्डित विश्वनाथ झा एकटा लब्धप्रतिष्ठित विद्वान् छलाह। बच्चा झाक महानताक सूत्रपात अहिठामसँ  भेलन्हि। पण्डित विश्वनाथ झा, बनैली, नरहन, आदि राजधानी सबहुमे  सेहओ बजाओल जाइत छलाह ताहि कारणेँ अध्यापन - कार्य लेल यथेष्ट समय हिनका नहि भेट पबैत छलन्हि। तैं  हेतु अन्यत्र जेबाक मोन नहियो रहला उत्र बाध्य ' ' पण्डित  बच्चा झाकेँ पढ़बाक लेल दोसर ठाम जाए पड़लन्हि।  ओहि समय मे नैयायिक प्रवर पण्डित बबुजन झाक प्रसिद्धि दर्शन शास्त्रक अध्यापन मे छलन्हि।  अतएव पण्डित बच्चा झा न्यायदर्शन पण्डित बबुजन झा सँ पढ़लाह। एकर पश्चात मीमांसा, वेदान्त आदि अन्य दर्शन शास्त्र सबहुक अध्यन काशी मे स्वामी विशुद्धानन्द सरस्वतीक चरण - कमलक नजदीकमे बैस केलन्हि। 
    एहि तरहेँ अध्यन समाप्तोपरांत जखन गाम एलाह ' अपन गाममे मिथिले नागरिक प्राचीन परम्पराक मोताबिक घरे पर एकटा पाठशाला स्थापित ' छात्र लोकनिकेँ पढ़ायब  शुरू ' देलन्हि। हिनक विद्वता अध्यापनक कुशलताक प्रशंसा सुनि अपन प्रान्तक के कहै, भारतक कोने - कोनसँ छात्रगण बड्ड बेसी संख्या मे आबि पढ़ए लगलाह। कालिदास जे अध्यापनक मापदण्ड स्थिर कएने छलाह ओहिसँ पूर्णरूपेँ सफल भेलाह। महाकविक मोताबिक ओहने अध्यापक सफल ' सकैत छथि जे प्रथमतः पाण्डित्यक आगार होथि ओकरा संग हुनकामे विद्यासंक्रान्त करबाक कला होइन्ह। दुनू बात पण्डित बच्चा झा मे विलक्षणरूपेँ छलन्हि। ताहिहेतु हिनक ख्याति शीघ्रहिं चहुँदिशि पसरि गेलन्हि। एतय धरि जे द्वारिकापीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वयं हिनकासँ अध्ययन करबालेल हिनका ससम्मान बजौलखिन शिक्षा ग्रहण केलाह। एहि तरहेँ पण्डित बच्चा झाकेँ शंकराचार्यक शिक्षक बनबाक अद्वितीय श्रेय प्राप्त भेलन्हि। सूरत मे आयोजित अखिलभारतीय पंडितमहासभामे हिनके मुख्य बनाओल गेल छलन्हि।  
वृत्यर्थ अध्यापन करब हिनक प्रवृतिक प्रतिकूल छलन्हि।  मुदा दरभंगाधिराज श्रीमान रमेश्वरसिंह जीक अतिशय अनुरोध पर किछ दिनक लेल धर्मसमाज संस्कृत कॉलेज, मुजफ्फरपुर के प्रधानाचार्यक पद स्वीकार केलन्हि। दुर्भाग्यसँ  एकहिं बरख मे हिनक देहावसान ' गेलन्हि।
अध्यापनक संग- संग अनेक टीकात्मक मौलिक ग्रन्थक रचना कयलनि। दर्शनक पठन - पाठन मे ओहि समय प्रचलित प्रायः सब ग्रन्थ पर अपन टिपण्णी केलन्हि। मात्र दार्शनिक - साहित्य नहि अपितु विशुद्ध साहित्य सबहुक रचना सेहओ कएलन्हि। मुदा हिनक प्रतिभा मूलतः भावयित्री होएबाक कारणेँ हिनकर काव्य मे पाण्डित्यक सेहओ प्रकाशन होइत छल। हिनक ग्रन्थ 'सुलोचना माधवचम्पू' दुर्भाग्यवश अद्यावधि अप्रकाशित छन्हि।  ओहिमे एकटा श्लोक अछि -
श्यामेयं   सुषमेन्धनं   सुरभिणा   सन्धुक्षितं   वायुना।
  कुर्वन्तं  जगदुज्ज्वलं  प्रसृतया सज्जयोत्ऱत्रन्या  धूम्यया। 
   सम्पाद्यातनुमग्रि मुज्ज्वलविधु  भ्राष्ट्रअङ्गकपोलेS घ्वग -
    प्राणान  भर्जतऋक्षलाजनिकरो  यद्  दृश्यते    खेंगने।।  

    भावार्थ - वसन्तक चन्द्रिका - चर्चित रजनी एकटा भड़भूँजाक दूकान अछि। रजनीए भूँज' वाली अछि। ओकर शोभे ओकर खोराक छै। सुरभि वसातकेँ फूँकि रहल अछि। ओकर लपटसँ सब दिशा उज्जवल ' गेल छैक। एहि भट्ठीमे कामाग्नि आगा (प्रस्तुत) कएल गेल छैक। चन्द्रमे ' पात्र छैक जाहिमे विरहविधुर व्यक्ति सबहुक प्राणकेँ राखी ' भूजल जएतैक। सम्पूर्ण नभ मण्डलमे जगह - जगह पर छिटकल वियोगी सबहुक प्राणरूप अन्नक अधन लागल छैक। हिनक कवित्ताक विषयमे मंगखककेँ श्लोक उदधृत ' देब यथेष्ट रहत :-

नो शक्य एव परिहृत्या दृढां परीक्षा ज्ञातुं मितस्य महतश्च कवेर्विशेषः
को नाम   तीव्रपवनागममंतरेण  भेदेन   वेति  शिखिदीप  मणिप्रदीपौ ।।

'मालविकाग्निमित्र' मे परिवाजिकक कहब छनि जे आचार्यक परीक्षा विद्यार्थी सभक योग्यताकेँ माध्यमसँ होइत अछि। पण्डित बच्चा झाक अत्यन्त विख्यात शिष्य परम्परा हिनक यशपाताकाकेँ अद्यावधि फहरा रहल छन्हि।
[2] महाराज लक्ष्मीश्वर सिंहक सिंहासनारोहणक बहुत दिन बाद धरि धौत परीक्षा नहि भेल छल। परीक्षा दरभंगा राजक संस्थापक श्री महेश ठाकुर द्वारा प्रारम्भ कएल गेल छल एहिमे मौखिक परीक्षा द्वारा श्रेष्ठ पंडितक चयन कएल जाइत छल। महाराज रमेश्वर सिंह एकर आयोजन करबओलन्हि श्री गंगानाथ झाकेँ एकर दायित्व देल गेल। श्री गंगानाथ झा परीक्षार्थीक रूपमे सेहो आवेदन कएने छलाह। महाराज परेक्षाक हेतु लिखित पद्धतिक आदेश देने छलाह। प्रश्निक नियुक्त्त भेलाह श्री बच्चा झा श्री शिव कुमार मिश्र। दुनू गोटे क्लिष्ट प्राश्निक कृपण परीक्षक मानल जाइत छलाह। मुदा ताहि पर श्री गंगानाथ झाकेँ 200 मे 197 अंक भेटलन्हि। महाराज पुरान परम्पराक अनुसार हिनका धोती तँ देलखिन्ह, मुदा नवीन पद्धतिक अनुसार दुशाला नहि देलखिन्ह, कारण संस्कृतक विद्वान् होयतहुँ श्री गंगानाथ झाक झुकाव अंग्रेजी दिशि छल। श्री बच्चा झा प्रकाण्ड पण्डित छलाह। महाराष्ट्र काशीक पण्डितक प्रसंगमे कहैत छलाह जे शब्द खण्डक प्रसंगमे सभ किछु नहि जनैत छलाह। ओहि समयमे महामहोपाध्याय दामोदर शास्त्री काशीक एकटा प्रसिद्ध वैयाकरण छलाह। विद्वान लोकनिक सुझाव पर दरभंगा महाराज गुरुधाममे एकटा पंडित सभाक आयोजन कएलन्हि। एहिमे हथुआ महाराज विशिष्ट अतिथि छलाह। काशीक सभ प्रमुख विद्वान एहिमे उपस्थित छलाह। प्रतियोगी छलाह पं.बच्चा झा .. दामोदर शास्त्री भरद्वाज। निर्णायक छलाह पं.कैलाश शिरोमणि भट्टाचार्या ..पं शिव कुमार मिश्र। एकटा सरल समस्यासँ शास्त्रार्थ प्रारम्भ भेल। एकर नैय्यायिक पक्ष लेलन्हि बच्चा झा व्याकरण पक्ष पंदामोदर शास्त्री।
दामोदर शास्त्री अपन जवाब अत्यंत सरल शब्दमे वैयाकरणिक आधार पर देलन्हि। आब बच्चा झाक बेर आयल। बच्चा झा गहन परिष्कार प्रारम्भ कएलन्हि। विद्वान लोकनिमे विवाद भेलन्हि जे हुनकर प्रश्न प्रासंगिक छन्हि वा नहि। निर्णायक लोकनि एकरा प्रासंगिक मानलन्हि। जौँ-जौँ बच्चा झा आगू बढ़ैत गेलाह हुनकर उत्तर दामोदर शास्त्री निर्णायक लोकनिक हेतु अबोधगम्य होइत गेलन्हि। मध्य रात्रि तक चलल। अन्ततः अनिर्णीत राखि कए सभा विसर्जित भेल।
सन् 1886 . केर गप छी। एकटा पुष्करिणीक उद्घाटनक उत्सवमे दामोदर शास्त्री जी काशीसँ मिथिलाक राघोपुर ग्राममे निमंत्रित भेल छलाह। ओतय हुनकर शास्त्रार्थ परम्परानुसार बच्चा झाक विद्यागुरु ऋद्धि झासँ भेल छलन्हि। एहिमे ऋद्धि झा परास्त भेल छलाह। गुरुक पराजयक प्रतिशोध लेबाक हेतु सन् 1889 मे बच्चा झा काशी गेलाह। बच्चा झाक उम्र ओहि समयमे 29 वर्ष मात्र छलन्हि। प्रायः दामोदर शास्त्रीकेँ लक्ष्य करैत छलाह, जे काशीक वैय्याकरणिक पण्डित लोकनिकेँ शब्द-खण्डक कोनो ज्ञान नहि छन्हि।बच्चा झा समस्त काशीक विद्वान् लोकनिकेँ शास्त्रार्थक हेतु ललकारा देलन्हि। दामोदर शास्त्रीसँ भेल शास्त्रार्थक वर्णन पछिला अंकमे कएल जाचुकल अछि। शास्त्रार्थ तीन दिन धरि चलल। शास्त्रार्थ सन्ध्यासँ शुरू होइत छल, मध्य रात्रि धरि चलैत छल।शास्त्रार्थक तेसर दिन दामोदर शास्त्री तर्क कएनाइ बन्न कए देलन्हि, श्रोताक रूपमे बच्चा झाक तर्क सुनैत रहलाह। पं शिवकुमार शास्त्री कैलाशचन्द्र शिरोमणि दू टा निर्णायक छलाह। शिरोमणिजीक दृष्टिमे वादी श्री बच्चा झाक पक्ष न्यायशास्त्रक दृष्टिसँ समुचित छल। शिवकुमारजीक सम्मतिमे प्रतिवादी श्री दामोदरशास्त्रीक पक्ष व्याकरणक मंतव्यानुसार औचित्यसम्पन्न छलन्हि।दुनू पण्डितक शास्त्रार्थ कलाक संस्तुति कएल गेल दुनू गोटेकेँ अपन सिद्धान्तक उत्कृष्ट व्यवस्थापनक लेल विजयी मानल गेल।
बच्चा झाजीकेँ समालोचकगण किछु उदण्ड अभिमानी मनबाक गलती करैत रहलाह अछि। मुदा एकटा उदाहरण हमरा लगमे एहन अछि, जाहिसँ गलत सिद्ध होइत अछि।
घटना एहन सन अछि। मुजफ्फरपुर धर्मसमाज संस्कृत विद्यालयमे बच्चा झा प्रधानाचार्य/अध्यक्ष पद पर छलाह, हुनकर शिष्य पं बालकृष्ण मिश्र ओतय प्रध्यापक छलाह। ओहि समय काशीक पण्डित-पत्रमे गंगाधर शास्त्रीक एकटा श्लोकक विषयमे बच्चा झा कहलन्हि, जे एहि श्लोकमे एकहि पदर्थ वारिधर एक बेर मृदंग बजबय बला चेतन व्यक्त्तिक रूपमे दोसर बेर वैह अम्बुद- जवनिकारूपी अचेतन रूपमे वर्णित अछि। एतय पदार्थाशुद्धि अछि। एहि पर हुनकर शिष्य बालकृष्ण टोकलखिन्ह- गुरुजी! एहिमे कोनो दोष नहि अछि। किएक तँ वारिकेँ धारण करए बला मेघ (वारिधर) केर स्थिति आकाशमे ऊपर होइत अछि, अम्बु (जल) केँ देबय बला मेघ (अम्बुद) केर स्थिति नीचाँ होइत अछि।अतः दुनूमे स्थानक भिन्नता अछि। वारिधर वारिद एहि दुनू शब्दसँ दू भिन्न अर्थ ज्ञात होइत अछि। ताहि हेतु एतय पदार्थक अशुद्धि नहि अछि।
श्लोक निम्न प्रकारे छल:-
मृदुमृदङ्गनिनादमनोहरे,   ध्वनित   वारिधरे  चपला   नटी।
वियति नृत्यति रङ्ग इवाम्बुदे, जवनिकामनुकुर्वति सम्प्रति॥
[1] हिनक किछु विशेष शिष्य सभक नामावली एहिठाम प्रस्तुत कएल जा रहल अछि।
स्वामी पूर्णानन्द, स्वामी परमानन्द, महामहोपाध्याय पण्डित बालकृष्ण मिश्र, पण्डित शशिनाथ झा ( मिथिला विद्यापीठ दरभंगा मे दर्शनविभागक अध्यापक ), पण्डित लक्ष्मीनाथ झा ( काशी हिन्दू विश्वविद्यालयमे दर्शनविभागक प्रधानाध्यापक), पण्डित  हरनाथ शास्त्री, पण्डित षष्ठिनाथ मिश्र आदि।
हिनक रचना
1.   व्याप्तिपंचक की टीका। 
2.   अवच्छेदकत्वनिरुक्ति विवेचन।
3.   व्युत्पत्तिवादगूढ़ार्थतत्वालोक।
4.   सक्यभिचारटिप्पण।
5.   खण्डनखण्डखाद्यटिप्पण।      
6.   न्यायभाष्यटीका।
7.   सिद्धान्तलक्षणविवेचन।
8.   व्याप्त्यनुगमविवेचन।
9.   शक्तिवादटिप्पण।
10. सत्प्रतिपक्ष टिप्पण।
11. कुसुमान्जलिवर्धमानटिप्पण।
12. अद्वैतसिद्धिचन्द्रिकाटिप्पण आदि।     

संकलन आ पहिल सन्दर्भसँ अनुदित- संजय झा "नागदह"
दोसर जाहिनाक तहिना -
दिनांक: 12 /12 /2017
 
सन्दर्भ: [1.] विद्वत विभूति, श्री राम चन्द्र झा लिखित, प्रकाशित - जयकृष्णदास हरिदास गुप्तः, चौखम्बा - संस्कृत - सीरीज ऑफिस, वर्ष – 1954  [2.] विकिपिडिया
फोटो साभार- वैदेही डॉट को डॉट इन